Friday, December 28, 2018

Pump Foundation method and installation

पंप की नींव विधि Foundation method and पंप के फिट करना installation of pumps


Pump foundation:- 

पंप की नींव ऐसी होनी चाहिए जो कि किसी भी प्रकार की वाइब्रेशन या हिल जुल को सहन करने तथा बेड प्लेट को एक सही स्थिति व कठोर सहारा बनाए रखें फाउंडेशन तैयार करने के लिए 1,3,5 का मिश्रण जैसे सीमेंट, रेत, बजरी की लगभग फाउंडेशन बनाने की ऊंचाई 7 सेंटीमीटर होनी चाहिए ।
interchangeability-limitfits-tollerance
फाउंडेशन के हर एक बोल्ट को उसके चारों तरफ एक पाइप के सलिव लगातार बिठाना चाहिए ताकि जरूरत पड़ने पर एडजस्टमेंट की जा सके स्लीव के अंदर का व्यास बोर्ड के व्यास से ढाई से 3 गुना होनी चाहिए बोल्ट को सतह पर निर्भर रखने के लिए बोलट हेड पर स्लीव के बीच एक वॉशर फिट करनी चाहिए ।फाउंडेशन बोल्ट व बेड प्लेट की 20 एमएम से 40 एमएम मोटी रोटींगं को ध्यान से रखते हुए बोल्ट की लंबाई ईतनी होनी चाहिए कि वह लगभग 6 एम एम नट से बाहर रहे।
Pump alignment


फाऊंडेशन को माउंटिंग के लिए तैयार करना है

पंप के यूनिट को सेट करने से पहले फाउंडेशन की ऊपरी सतह से कंक्रीट और दूसरे पदार्थों को हटा देना चाहिए ताकि ग्राउट सलीव व बोल्ट के बीच में घुस सके।

यूनिट को Foundation पर बिठाना
 पंप यूनिट को दिए हुए बेजिज के ऊपर जगह पर रखें बेजिज पॉइंट पर होनी चाहिए तो पंप के सेंटर के नीचे कई जगह बेजिज बेड प्लेट के मध्य वाले हिस्से पर भी वेजिज की आवश्यकता पड़ती है पंप व प्राईमूवर की कपलिंग को डिस्कनेकट  करें ।
Pump on the foundation


वेजिज की एडजस्टमेंट करते हुए यूनिट को सही लेबल पर लाएं या ग्राउट के लिए सही दूरी 20 एमएम से 40 एमएम सेक्शन व डिस्चार्ज फलो की लेवल को प्लंग करें। और एडजस्ट करते हुए कपलिंग के दोनों हिस्सों का समरेखण करें।
 वेजिज को एडजस्ट करते करने के बाद फाउंडेशन बोल्ट का अंतिम रूप से सभी नट टाइट करने चाहिए जबकि ग्राउट 48 घंटे तक सेट हो चुका है।
What is tap?

यूनिट को फाउंडेशन के ऊपर ग्राउट करना 

फाउंडेशन के चारों तरफ लकड़ी का बांध बनाए तथा कंक्रीट फाउंडेशन की ऊपरी सतह को गिला करें ।बेड प्लेट के ऊपरी हिस्से पर बने छेद को ग्राउट को डाले गा्उट इतना पतला होना चाहिए कि वह ग्राउट प्लेट से नीचे पहुंच सके परंतु इतना गिला भी ना करें की सीमेंट रेत से अलग होकर स्तह पर अलग हो जाए।
1. सीमेंट के एक हिस्से में तीन हिससे रेत होना चाहिए।
2. ग्राउट को डालते समय उसे लगातार हिलाते रहना चाहिए ताकि हवा को बाहर निकाला जा सके।
 3. लकड़ी के बांध को ऊपर से हथौड़े की सहायता से धीरे-धीरे चोट मारने चाहिए ताकि साफ फाउंडेशन बने।
 4. ग्राउट को 48 घंटे तक सूखने दें।
dail-test-indicator

समरेखण या Alignment 

एक पंप को बिठाते समय समरेखण एक ही महत्वपूर्ण पहलू है ।यदि प्राइम मूबर या पंप का फैक्ट्री से संरेखण किया जाता है फिर भी स्थानांतरित के समय  बेड प्लेट के फाउंडेशन बोल्ट को और समतल तरीके से टाइट करने से समरेखण हो सकता है इसलिए प्रयोग करने से पहले उसका संरेखण करना चाहिए अलाइनमेंट कप लिंग को पराया तीन स्थितियों के लिए चेक किया जाता है।
1. कपलिंग के हिससों की समानतंरित
 कोणीय समरेखण
 पंप शाफ्ट व प्राइम मूवर 
शाफ्ट का विस्थापन किसी भी सथिर में एक हीससे से कप लिंग के विस्थापन डी 125mm से ज्यादा नहीं होना चाहिए ।
2. कप लिंग के दोनों हिस्सों का गलोब लगभग 2 एमएम होना चाहिए ।
3. बेल्ट ड्राइव में पंप की शाफ्ट प्राइम मूवर की शाफ्ट समानांतर होनी चाहिए ।इनको चेक करने के लिए एक धागे का प्रयोग करना चाहिए जिससे ड्राइवर पुलियों  के फेस के चारों पॉइंट पर घुना चाहिए।
counter-sinking how to work with it.
समरेखण या Alignment
पंप वह प्राइम मूवर को आपस में एक समान समरेखण होना चाहिए यदि पंप व प्राइम मूवर का समरेखण ना हो तो उससे बहुत ज्यादा हानियां हो सकती है जैसे कि बियरिंग का टूटना बुश का खराब होना आदि मुख्य कारण है।

प्राईमूवर एक प्रकार का ऊर्जा देने वाला यंत्र होता है जिससे पंप को ऊर्जा दी जाती है। इन दोनों की शाफट के  के द्वारा आपस में  मिलाया जाता है और जैसे ही प्राइम मूवर  को गति दी जाती है  तो पंप  खुद ही  घूमने लगता है  उस स्थिति में पंप से किसी भी liquid पदार्थ को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने के लिए आसानी होती है प्राइम मूबर एक प्रकार की ऊर्जा देने वाला यंत्र है।

लेवल या समरेखण:- 
पंप व प्राईमूवर को आपस में है एक समान समय रेखा होना बहुत जरूरी है एक स्तर में लाया जाता है उसे लेवल कहते हैं किसी वस्तु को चारों किनारों की सत्ता में लाइन की प्रक्रिया को भी लेबलिंग के नाम से जाना जाता है चारों शवों को एक लेवल में लाने के लिए वाटर लेवल का प्रयोग किया जाता है लेबल भी पंप प्राइम मूवर के लिए महत्वपूर्ण पहलू है लेवल ठीक ना होने से पंप प्राइम ओवर को नुकसान हो सकता है इसलिए लेवलिंग बहुत जरूरी है।

www.bloggeryash.co.in
Thanks for reading this blog


Wednesday, December 26, 2018

Seal and lubricant

सील क्या है what is seal? और  लुब्रिकेंट क्या है  what is lubricant?

Seal:-जब दो पार्ट्स को आपस में मिलाकर फिट किया जाता है उन दोनों भागों के बीच में सील का प्रयोग किया जाता है ताकि वहां से तरल पदार्थ बाहर की तरफ लिक ना करें सील का प्रयोग गति और तापमान तथा भार के अनुसार किया जाता है सील दोनों पार्ट्स के बीच में एक अच्छे जॉइंट का काम भी करती है और लीकेज को रोकने में सहायक भी होती है।

सील के प्रकार types of seals

screw-driver
  1. Synthetic seal
  2.  rubber seal 
  3.  gasket cement
  4.  plastic washer type seal
  5.  joint seal
1. Synthetic scene:- यह एक लिक्विड टाइप लोशन की तरह होती है।इस ट्यूब को दोनों भागों की स्तहो के ऊपर लगाया जाता है और भागों को फिट किया जाता है फिट करने के बाद यह सिंथेटिक सील सूख कर एक टाइट जॉइंट बना देती है।
2. रबर सील :- यह सील लेदर की बनी होती है यह पार्ट्स के डिजाइन के अनुसार कटी हुई होती है दोनों पार्ट्स को जब आपस में फिट किया जाता है तब उन पार्ट्स के बीच में रबड़ सील का प्रयोग किया जाता है।
3. गस्केट सील :- गैस किट सील का प्रयोग दोनों पार्ट्स के बीच में किया जाता है ताकि वहां से द्रव्य लीक न करें गैसकिट शीट  को भी पार्ट्स के डिजाइन के अनुसार काटकर के फिट किया जाता है।
4. Plastic washer type seal:- इस सील का प्रयोग उस स्थान पर किया जाता है जैसे वहां पंप में शाफ्ट केसिंग से बाहर निकलती है उस स्थान पर शाफ्ट और केसिंग के बीच में जो गैप रहता है उसे पूरा करने के लिए प्लास्टिक वाटर टाइप सील का प्रयोग किया जाता है इसका प्रयोग  इसलिए किया जाता है ताकि अंदर से द्रव्य बाहर ना निकले और बाहर से हवा पंप के अंदर ना जाए।
looking-device

5. जैन सील:- जैन सील का प्रयोग ज्यादातर इंजन के सिलेंडर हेड के ऊपर किया जाता है क्योंकि वहां पर पार्ट्स के बीच में तापमान बढ़ जाता है तापमान बढ़ने के कारण वहां पर दूसरी सिले पिघल कर खराब हो जाती है जैन सील धातु की चादर की बनाई जाती है तापमान बढ़ने के कारण उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है उसे जेन  सील कहते है।
6. Gasket cement:- गैस किट सीमेंट का प्रयोग उस स्थान पर किया जाता है जहां पर बड़ी मात्रा में लीकेज को रोकने के लिए सीमेंट का एक लेप लगाया जाता है ताकि द्रव्य लिक न करें।

लुब्रिकेशन क्या होता है what is lubricant?

जब दो स्तह  एक दूसरे के संपर्क में रहकर अपेक्षित गति करती है तो घर्षण उत्पन्न होता है यह घर्षण  मिलने वाले अंगों की गति को प्रतिरोधी बल प्रदान करता है जिसके कारण शक्ति की हानि होती है विभिन्न विभिन्न प्रकार की मशीनें तथा उपकरण में कुछ अवयव एक दूसरे के संपर्क में रहकर भिन्न-भिन्न प्रकार की गति करते हैं जैसे बियरिंग,वाल्व, पिस्टल आदि इस आपसी गति के कारण उनमें टूट-फूट की संभावना हो सकती है इनको टूट-फूट से रोकने के लिए इन स्थानों के बीच स्नेहन या लुब्रिकेंट की एक पतली परत बना दी जाती है जिन्हें लुब्रिकेशन करना कहते हैं।
           जब दो मेंटिंग सरफेस लुब्रिकेंट की पतली सतह फिल्म में पूर्णतया अलग रहती है तब यह फिल्म लुब्रिकेशन कहलाता है जब मैटिंग्स सतह  के बीच उनको अलग करने के लिए लुब्रिकेंट काफी नहीं होता तब यह बाउंड्री लुब्रिकेशन कहलाता है बाउंड्री लुब्रिकेशन में मेंटिंग स त ह कभी-कभी ही संपर्क में आती है।

लुब्रिकेशन के उद्देश्य main objective of lubrication

  1. घर्षण को कम करना शक्ति की हानि तथा टूट-फूट आदि को कम करना।
  2. घर्षण के द्वारा उत्पन्न ऊष्मा को दूर कर कूलिंग इफेक्ट प्रदान करना।
  3. piston ring or cylinder दीवार के बीच इफेक्टिव सील बनाना तथा गैसों के पलायन को रोकना।
  4. बियरिंग तथा अन्य मशीनी अंगों के बीच शौक एवं वाइब्रेशन को अवशोषित करना तथा शोर कम करने में सहायता करना।
  5. गतिशील अंगो का जहां तक संभव हो सके घिसा ब कम करना।
  6. मशीनी अंगों को क्लीनिंग एजेंट के रूप में कार्य करना।
  7. बियरिंग के सरंक्षण को रोकने में सहायता करना।
Follow our another blog:-


लुब्रिकेशन का वर्गीकरण classification of lubrication

  1. Solid lubrication:- hard lubricant, grafied, lead sulphide ,माइका, टलका ,मॉम आदि प्रमुख है।ठोस बियरिंग तथा मशीन के अंगों जो निमन दाब एवं गति पर कार्य करते हैं पर प्रयुक्त किए जाते है।
  2. Semi solid lubricant:- इसमें वे लुब्रिकेंट आते हैं जो साधारण रुप तापमान पर नहीं बहते यह लुब्रिकेंट मिनरल ऑयल तथा फैटी ऑयल से बनाए जाते हैं इन्हें ग्रीस के नाम से भी जाना जाता है इसका प्रयोग वहां होता है जहां तेल का प्रयोग नहीं कर सकते या नहीं हो सकता।
  3. Liquid lubricants:- द्रव लुब्रिकेंट में सभी प्रकार के मिनरल ऑयल पशु एवं वेजिटेबल ऑयल आते हैं यह सस्ते होते हैं ऑयल में लॉर्ड ऑयल तथा स्पर्म ऑयल मुख्य है। वेजिटेबल ऑयल, ऑलिव ऑयल ,कॉटन सीड ऑयल तथा लाइन सैड ऑयल आदि आते हैं इसके अतिरिक्त सिंथेटिक ऑयल पानी तथा सिलिकॉन आदि भी द्रव लुब्रिकेंट के रुप में प्रयोग किए जाते हैं।
  4. Gas lubricants:- इसके अंतर्गत वायु ,हाइड्रोजन ,नाइट्रोजन आदि गैसों का प्रयोग किया जाता है दो या अधिक लुब्रिकेंट को मिलाकर आवश्यकता अनुसार वांछित गुण वाला लुब्रिकेंट तैयार कर प्रयुक्त किया जाता है।

लुब्रिकेंट के आवश्यक गुण

  1. श्यानता किसी तरल की श्यानता उसके बहने की योग्यता की माप है।
  2. इसमें ऊष्मा अवशोषित करने तथा दूर करने की अधिकतम क्षमता होनी चाहिए।
  3. लुब्रिकेंट ऑयल का चिकना पन अधिक होना चाहिए ताकि घर्षण तथा अंगों की गिसावट कम हो।
  4. इसमें उच्च फिल्म सामर्थ्य होना चाहिए।
  5. इसे सरंक्षण प्रतिरोधी होना चाहिए ताकि पार्ट्स  संक्षारण से बचा सके।
  6. एक लुब्रिकेंट को अधिक ताप पर वाष्प कृत नहीं होना चाहिए इस की वाष्प शीलता कम होनी चाहिए।
  7. लुब्रिकेंट में आमलिय गुण नहीं होना चाहिए अन्यथा बियरिंग आदि में क्ष रन करेगा।
  8. सुरक्षा की दृष्टि से प्रज्वलन शिल और जहरीला नहीं होना चाहिए।
  9. उसमें स सतहों को साफ करने की प्रवृत्ति होनी चाहिए।
  10. उसे कम कीमत का होना चाहिए।
Thanks for reading this blog



Monday, December 24, 2018

Valve

वाल्व  क्या है what is valve? वाल्व के प्रकार types of valve 


Q.1 वालव किसे कहते हैं?
यह पाइप सिस्टम या मशीनरी में प्रयोग किए जाने वाला यंत्र है यह पाइप सिस्टम के दो हिस्सो को जोड़ने के लिए या आइसोलेट करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
Q.2 वाल्व कितने प्रकार के होते हैं?
बालव निम्नलिखित प्रकार के होते हैं
marking-scriber-punch

  1. स्टार्ट flow valve
  2. Back flow valve
  3. दवाव  को रेगुलेटर करने वाला वाल्व
  4. Pressure relief valve

1. Start flow valve:- 

इस वाल्व की मुख्य विशेषता यह है कि जब यह खुल जाता है तो तरल प्राय बहने में कम से कम बाधा डालता है यह दबाव में भी कम हानि करता है।

2. Back flow को रोकने वाला वॉलव:-

इस प्रकार के वॉलव तरल द्रव्य के बहाव से खुल जाता है और तरल द्रव्य को उल्टी दिशा की ओर बहने की स्थिति में बंद हो जाता है इस प्रकार के वाल्व को चेक वाल्व कहते है।

3. बहाव को रोकने वाला वाल्व :-

इस प्रकार के वॉल्व में बहाव को रेगुलेटर करने के लिए इस तरह बाधा उत्पन्न की जाती है या तो तरल द्रव्य  जैसे बहाव की दिशा को बढ़ाकर  या बदल कर उत्पन्न करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

4. दबाव को रेगुलेटर करने वाला वाल्व:-

यह वाल्व दवाब या लाइन के दबाव को कम करके उनको ऊर्जा दवाब पर रखने के लिए प्रयोग किया जाता है यदि लाइन का दबाव कम या ज्यादा हो तो वाल्व सर्विस दबाव को उतना ही रखते हैं।

5. Pressure relief valve:-

इसका प्रयोग जहां पर सिस्टम में है बहुत ज्यादा प्रेशर या दबाव नुकसान कर सकता है इस प्रकार के वॉलव प्रायः   स्प्रिंग लेटिड होते हैं यह तभी खुलता है जब दबाव उसकी दिशा में घूमता है जिस पर वाल्व को फिट किया जाता है।

प्रयोग के आधार पर वालव के प्रकार

  1. Gate valve:- इस प्रकार के वाल्वो को या तो पूरा खुला रखा जाता है जिससे यह कम से कम बाधा उत्पन्न कर सके या इसे पूरी तरह से बंद करना चाहिए इस तरह से इन न्वॉल्व का प्रयोग पंपिंग प्रेक्टिस के लिए किया जाता है।
  2. ग्लोब वाल्व:- यह स्क्रु turn वालव होता है इसकी बॉडी गोलाकार होती है इसका प्रयोग बहाव को रोकने के लिए किया जाता है जहां सिस्टम पूरी तरह से आइसोलेट की आवश्यकता होती है इसकी जाली में ग्राइंड रहता है जिस पर एक गोल शीट बैठती है।
  3. बॉल वाल्व :- इसका प्रयोग वहां होता है जहां तरल द्रव्य को स्वतंत्र रूप सेे बहने की आवश्यकता होती हैै इसमें  वाल्व एक जालि में  ग्राइंडर रहते हैं और एक वर्गाकार शीट पर बैठते हैं।
  4. प्लग वाल्व:- यह बालव बहुत ही साधारण प्रकार के होते हैं इसे cock भी कहा जाता  है interchangeability-limitfits-tollerance इस प्रकार के वॉलव में टेपर या समानअंतर प्रकार की शीट होती है प्राय पानी, गैस ,रासायनिक तरल द्रव्य सिस्टम में होता है इस प्रकार के वाल्व का मुख्य का भाग बॉडी प्लग व ऊपर की clemp होते हैं।
  5. डॉया फ्रेम :- इसका तरल प्राय मिलने में तरल द्रव्य को सफलता देता है इसमेंं daya फ्रेम होती है जो शीट पर बैठकर  तरल द्रव्य के बाहव को रोकती हैै इसका प्रयोग वहां  पर करते हैं जहां पर जंग व लीकेज वाल्व की maintenance के काबू मेंं लाने की आवश्यकता होती है।
  6.  वॉटर फ्लाई वॉलब:- इस प्रकार के वाल्व को 90° के flow को पूरी तरह खोलने व बंद करने के लिए प्रयोग किया जाता ।है।
  7. Needle valve:- इसमें स्टैंन नीडल के आकार की  तरह होती है कम प्रयास से बंद हो जाते हैं ते नोकदार निडल एकदम सही फिट हो जाती है इनका प्रयोग साधारणतया instruments guage मोटर लाइन में किया जाता है।
  8. Chek वाल्व :- यह बालव non-return बालव होते हैं इसे फुटबॉल में भी कहते हैं इसमें तरल द्रव्य का बहाव एक ही दिशा में होता है इसका प्रयोग वहां किया जाता है जहां तरल द्रव्य का बहाव उलटी दिशा में ना हो इसे सेफ्टी वाल्व भी कहा जाता है फुटबॉल का प्रयोग Steiner के साथ पंप की सक्शन पाइप के ऊपर किया जाता है जिससे पंप ki suction साइड में खाली होने से बचाया जाता है यदि फुटबॉलव का प्रयोग ना किया जाए तो पंप को स्टार्ट करते समय प्राईमिंग की आवश्यकता पड़ती है इस प्रकार के वाल्व में डिस्क लगी होती है जो तरल द्रव्य  के बहाव को रोकती है।

Thanks for reading this blog

Saturday, December 22, 2018

Lovh Roter pump

लोव रोटर पंप और टरबाइन पंप lovh Roter pump and  turbine pump

Lovh  pumps की क्षमता गति के समानुपाती होती है तथा हेड का इनकी क्षमता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता यह पंप सेल्फ प्राईमिंग नहीं होता है इनका ज्यादातर प्रयोग उद्योगों में किया जाता है जहां पर सप्लाई की आवश्यकता होती है जैसे जूस बनाने वाली तथा दवाइयां बनाने वाली है और खाने की कुछ वस्तुएं बनाने वाले कारखानों में इनकी ज्यादा
combination-protractor
आवश्यकता होती है और इनका प्रयोग जंग लगने वाले हैं रोटर पंप एक अंत आंतरिक गियर पंप की तरह कार्य करते हैं अंतर केवल इतना होता है कि पंप के अंदर गियर के बजाय लोव रोटर लगा होता है लोव पंप रोटर के केंद्र में से एक फ्लूड टाइट ज्वाइंट बनाते हैं तरल द्रव्य की पेरा फेरी के साथ बाहर की तरफ को डिस्चार्ज की साइट से बाहर फेंकता है यह पंप दो तीन चार या पांच लोव वाले होते हैं इस प्रकार के पंपों को लोव रोटर पंप कहा जाता है ।
chisels

टर्बाइन पंप Turbine Pump:-

Turbine pump  सेंट्रीफ्यूगल पंप का सुधरा हुआ  रूप है इन पंपों में पानी को रोकने के लिए अपकेंद्रीय बल  का प्रयोग किया जाता है reamers. परंतु हाउसिंग केसिंग का डिजाइन ऐसा होता है कि यह पंप उसी साइज के सेंट्रीफ्यूगल पंप से ज्यादा सक्शन हेड  से डिस्चार्ज दे सकता है टरबाइन पंप में पानी दबाव के साथ इंपेलार के बाहरी रिम के बीच बाहरी किनारों के पास छोटी मोटी पैकेट होती है
scrapers-keyway टरबाइन पंप का प्रयोग द्रवित पेट्रोलियम गैस को पंप करने के लिए किया जाता है इसका प्रयोग एसिड अल्कोहल को खींचने के लिए किया जाता है।

www.bloggeryash.co.in

Thanks for reading this blog


Thursday, December 20, 2018

Gear pump

गियर पंप  Gear pump गियर पंप की बनावट shap of gear pump   गियर पंप का कार्य working mathod of gear pump

गियर पंप दो प्रकार के होते हैं इंटरनल गियर पंप एंड एक्सटर्नल गियर पंप।
यह पंप 300 पीएसआई तक दवाब दे सकते हैं तथा तेल को पंप करने के लिए बहुत उपयोगी होता है यह साधारण तया धातुओं के बने होते हैं अतः तरल द्रव्यों के लिए इन पंपों का प्रयोग नहीं होता है क्योंकि इन पंपों के अंदर जंग लगने की आशंका होती है इन पंपों की क्षमता 90% से अधिक होती है।

What is counter sinking?

गियर पंप के बनावट

एक साधारण गियर पंप में एक ही साइज के व्यास के आपस में मेल खाकर चलने वाले दो स्पर्श गियर होते हैं यह गियर दोनों अलग-अलग स्पैंडल पर फिट किए जाते हैं जैसा कि बताया गया है 1 गियर को ड्राईवर गियर तथा दूसरे को ड्रिवन गियर कहा जाता है इन गियर को हाउसिंग या केसिंग के अंदर फिट किया जाता है इन पंपों को सीधे ही प्राइम मूवर के द्वारा या गियर के द्वारा शक्ति दी जाती है स्पर्श गियर की गति 600 आर पी एम तथा  डिस्चार्ज पेसर 1500 पी एस आई तक होती है।
How to work with tap?

गियर पंप के कार्य working method of gear pump

जब ड्राईवर गीयर को पावर देख कर घुमाया जाता है तो ड्रिवन गीयर भी ड्राइवर गीयर की विपरीत दिशा में घूमता है जिसकी वजह से पंपिंग एक्शन पैदा होता है दोनों की हाउसिंग के अंदर बिल्कुल साथ-साथ फिट किया जाता है तथा तेल को पेरा फेरी के साथ ले जाकर डिस्चार्ज कर देते हैं जैसा कि सवशन  साइड में गियर के दांतों का प्रत्येक जोड़ा आपस में मिलता है तो इस साइड का आयतन दोनों की दूरी के बराबर आयतन से घट जाता है जिसकी एक वजह से सक्शन का प्रवाह पैदा होता है जहां गियर के दांत आपस में मिलते हैं उस जगह पर फ्लूड फाइल ज्वाइंट बन जाता है
What is interchangeability ,limit,fits and tollerance?
सक्शन  साइड से आने वाला तेल दांतों के कट्स  के द्वारा बनाया जाता है तथा पेरा फेरी के साथ होता हुआ डिस्चार्ज से बाहर होता है गियर का प्रत्येक दांत एक रिसिप्रोकेटिंग पंप के plunger की तरह कार्य करता है जिसकी वजह से तरल द्रव्य का दवाब अंदर बहार भेजना शुरू कर देता है इस पंप के डिस्चार्ज साइड में एक स्प्रिंग लोडिंग स्लीव वॉल्व लगा होता है यह वाल्व पंप को क्षति से बचाता है यदि किसी वजह से डिस्चार्ज साइड में ब्लॉक आ जाती है तो सक्शन स्प्रिंग के विरुद्ध वाल्व खुल जाता है तथा तरल द्रव्य को दोबारा सक्शन  साइड में भेज देता है जिससे दबाव बढ़ने का पता चलता है तो उसे ठीक करने पर दबाव कम हो जाता है।और फिर वाल्व अपने आप बंद हो जाता है तथा तरल द्रव  फिर से सिस्टम मैं जाना शुरू कर देता है।


Thanks for reading this blog

Tuesday, December 18, 2018

Rotary pump

रोटरी पंप Rotary pump रोटरी पंप का पंपिंग एक्शन pumping action रोटरी पंप के प्रकार types of rotary  PUMP

रोटरी पंप एक पॉजिटिव डिस्प्लेसमेंट पंप होता है जिसमें   पंपिंग एक्शन पंप को घूमने वाले और स्थिर हीसों के द्वारा पैदा किया जाता है इस पंप की यह विशेषता है कि डिस्चार्ज किए हुए तरह द्रव्य की मात्रा पंप की गति पर निर्भर करती है रोटरी पंप में रेसिप प्रोकेटिंग पंप की भांति इनलेट आउटलेट वाल्व नहीं लगे होते हैं रोटरी पंप का डिस्चार्ज स्थिर होता है जबकि रेसिपी प्रोटिंग हीलने वाला होता है रोटरी पंप का प्रयोग तरल द्रव्य के अनुसार किया जाता है रोटरी पंप का प्रयोग इंडस्ट्रियल प्लांट ,पावर स्टेशन में तेल, पानी इत्यादि तरल द्रव्य को उठाने तथा सर्कुलेट करने के लिए किया जाता है रोटरी पंप में सेंट्रीफ्यूगल पंप से कम फाल्ट पड़ते हैं क्योंकि जिस त्रल द्रव्य को पंप करना होता है वह तरल द्रव्य उसके सभी हीस्सो की लुब्रिकेशन करता रहता है।
dail-test-indicator

रोटरी पंप का पंपिंग एक्शन pumping action of rotary pump

सभी रोटरी पंप ओं का पंपिंग एक्शन पॉजिटिव डिस्प्लेसमेंट होता है रोटरी पंप में दो पार्ट होते हैं इनलेट और आउटलेट।
रोटरी पंप का पंपिंग एक्शन निम्नलिखित तीन प्रक्रियाओं में होता है:-
  1. आउटलेट के लिए बांध इनलेट के लिए खुला। Close for outlet and open for inlet
  2. आउटलेट के लिए खुला और इंग्लैंड के लिए बंद। Open for outlet and close for inlet
  3. आउटलेट के लिए बंद और इंग्लैंड के लिए बंद। Cloes for outlet and cloes for inlet.
रोटरी पंप का सही पंपिंग एक्शन इनलेट के लिए खुला होने के कारण यह स्मूथ डिस्चार्ज पैदा करता है स्मूथ डिस्चार्ज गति के आधार पर होता है और बंद इन लेट पंप की गति पर निर्भर करता है।
locking device

रोटरी पंप के प्रकार types of rotary Pump:-

  1. simple impeller pump
  2.  flexible impeller pump
  3.  gear pump
  4.  lobe rotor pump 
  5. vane pump
  6.  screw pump
  7.  liquid ring pump
  8.  roots pump
1. Simple impeller pump:- . यह पंप छोटे आकार में बनाए जाते हैं तथा इनकी क्षमता सीमित होती है यह एक सिंगल स्टेज अपकेंद्रीय पंप होते हैं एक विशेष गति पर कार्य करते हैं यह सस्ता व साधारण पंप होता है तथा साफ तरल   द्रव्य को एक मात्रा में एक जगह से बड़े हुए दबाव के अंदर भेजने का कार्य करता है यह पंप सेल्फ प्राईमिंग नहीं होता है तथा छोटे आकार के काम की लिफ्ट 1 मीटर से कम होती है।
2. Flexible impeller pump:- यह पंप मजबूत माने जाते हैं इसके इंपैलर की वजह से इसका दबाव सीमित है साधारण दया यह पर आया और 40 डिग्री से 50 डिग्री पीएसआई दबाव तक काम करते हैं इसमें 5 मीटर की सक्शन लाइट लिफ्ट संभव है इन पंपों में एक फ्लैक्सिबल व्हेन इंपैलर लगा होता है जिसे की सेटिंग सक्शन की गोलाई के सिंह के बीच मध्य में फिट किया जाता है शेट्टी सचिन के किनारों पर इनलेट आउटलेट पार्ट बने होते हैं।

फ्लैक्सिबल पंप की कार्यविधि :-
जब इंपैलर unsetric सक्शन से आते जाते हैं तो निर्वात पैदा होता है चेंबर के अंदर आयतन बढ़ता है जिसकी वजह से पंप के अंदर तक द्रव्य खींचा जाता है अतः यह पंप सेल्फ प्राईमिंग पंप होता है इसके इंपैलर प्राय न्यू पिन रबड़ के बने होते हैं।।
www.bloggeryash.co.in

Thanks for reading this blog



Friday, December 14, 2018

Parts of reciprocating pump

रिसिप्रोकेटिंग पंप के भाग  Describe the construction of power pump with its parts liquid end and power end

रिसिप्रोकेटिंग पंप के भाग निम्नलिखित होते हैं
/try-square-hammers

  1. Liquid end
  2. Power end

1 Liquid end

लिक्विड एंड में निम्नलिखित पार्ट होते हैं जिसमें सिलेंडर ,इंजन ,वाल्व, स्टाफिंग बॉक्स ,मैनीफोल्ड, सिलेंडर हैड
marking tools scriber-punch
  1. Silender:- सिलेंडर पंप कि वह बॉडी होती है जिसके अंदर प्रेशर पैदा होता है वह पिस्टन या  प्लूंजर की सहायता से प्रेशर पैदा करता है।
  2. Plunger:- plunger प्रेशर उत्पन्न करता है यह निकल स्टील का बना होता है प्लूंजर टाइप रिसिप्रोकेटिंग पंप वॉटर ऑयल , एसिड के पंप करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
  3. Piston:- 200 पीएसआई तक पीसटन का प्रयोग किया जाता है तथा इसे अधिक प्रेशर के लिए प्लेनजर का प्रयोग किया जाता है पिस्टन सिलेंडर के अंदर मूव करता है।
  4. Stufing box :- स्टाफिंग बॉक्स में बॉक्स बुशिंग तथा ग्लैंड पैकिंग की जाती है जिससे तरल डब्बे की लीकेज को रोकने के लिए बनाया जाता है।
  5. Sylander Head or Liner:- सिलेंडर या लाइनर प्राय निकल बृष्टि धातुओं का बना होता है इसकी लंबाई पंप के स्ट्रोक से थोड़ी ज्यादा होती है।
  6. Valve:- वालु के मुख्य भाग शिट और प्लेट होते हैं वह स्प्रिंग के द्वारा चलते है।
  7. Manifold:- मैनीफोल्ड वह चेंबर होता है जिसका प्रयोग सिलेंडर से पहले या बाद में तरल द्रव्य को इकट्ठा करने को डिलीवरी करने में प्रयोग किया जाता है।

2. Power end 

Power एंड में भी निम्न लिखित पार्ट होते हैं क्रैंक शाफ्ट कनेक्टिंग रोड, बियरिंग,main bearing crank pin bearing ,lubrication

  1. Crank shaft:- crank Shaft पराया कास्ट आयरन स्टील कास्ट स्टील की बनी होती है इसका प्रयोग घूमने वाली गति को आगे पीछे वाली गति में परिवर्तित करने के लिए किया जाता है।
  2. Connecting road:-  कनेक्टिंग रोड, क्रैंक पीन की घूमने वाली को एस्लेटिंग फोर्स में बदलती हैं। कनेक्टिंग रोड forge steel or cast steel होती है।
  3. Bearing:- पावर पंप में स्लीव एंटी फ्रिक्शन बेयरिंग का प्रयोग किया जाता है इसलिए बियरिंग का प्रयोग केवल 40 आर पी एम तक किया जाता है इसे ज्यादा स्पीड होने के कारण इसके बीच में लुब्रिकेशन परत नहीं बन पाती इसलिए ज्यादा स्पीड होने के कारण स्लीव बेयरिंग का प्रयोग नहीं किया जाता है।
  4. Main bearing:- यह प्राय दो टुकड़ों में होते हैं यह पिस्टन वह plunger को बैलेंस कर लेते हैं यह बियरिंग ब्राउजर बैक्ड धातु के स्प्लिट बेयरिंग होते हैं।
  5. Crank pin Bearing:-  यह क्रैंक स्प्लिट टाइप के होते हैं क्रैंक पिन बियरिंग में रोलर बेयरिंग का भी प्रयोग किया जाता है गति वह भार के अनुसार ही क्रैंक पिन बियरिंग का प्रयोग किया जाता है।
  6. Lubrication:- साधारण लुब्रिकेशन सिंपलेक्स सिस्टम से की जाती है लुब्रिकेशन करने के लिए पंप भी लगा होता है इन सभी पार्ट्स को लुब्रिकेट करने के लिए इसमें पावर एंड में एक sunk बना होता है जिसके अंदर लुब्रिकेशन तेल डाला जाता है जिसे पावर एंड में लुब्रिकेशन की जाती है जब क्रैंक शाफ्ट चलती है तो वह लुब्रिकेशन को साथ में उठाती है और सभी पार्टस में स्नेहक पहुंच जाता है और स्नेहन होना शुरू हो जाता है स्नेहन को मापने के लिए पावर एंड में एक डिपस्टिक लगी होती है जिससे स्नेहन को कम ज्यादा माप लिया जाता है।


Thanks for reading this blog



Wednesday, December 12, 2018

Reciprocating pump

रिसिप्रोकेटिंग पंप (Reciprocating pump)रिसिप्रोकेटिंग पंप के सिद्धांत (principles of reciprocating pump) रिसिप्रोकेटिंग पंप का वर्गीकरण classification of reciprocating pump


साधारण प्रकार की रेसि procating  पंप में एक ही piston लगा होता है जो कि सिलेंडर के अंदर ऊपर नीचे या आगे पीछे हो कर चलता है पिस्टन को कनेक्टिंग रोड़ के द्वारा मोटर से दी हुई पावर power से चलाया जाता है इसमें dail-test-indicator सक्शन वह डिस्चार्ज वाल्व लगे होते हैं रिसिप्रोकेटिंग पंप को suction साइड से तरल द्रव को खींचने के लिए सिलेंडर के अंदर पिस्टन की reversing गति को प्रयोग किया जाता है तथा तरल द्रव दबाब  के अंदर डिस्चार्ज साइड में जाता है इस पंप को पॉजिटिव डिस्प्लेसमेंट पंप कहते हैं।

रिसिप्रोकेटिंग पंप के सिद्धांत तथा कार्य:- 

तरल द्रव्य को हटाना तथा डिस्चार्ज करना तरल द्रव्य को ऊपर उठाना तथा एक तरल द्रव्य को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाना।
Principles of reciprocating pump


रिसिप्रोकेटिंग पंप वह पंप होता है जिसमें एक तरफ piston या प्लजर दिए हुए तरल द्रव्य के आयतन को  हटाता है। रिसिप्रोकेटिंग पंप का सिदांत यह होता है कि एक ठोस पदार्थ तरल द्रव्य को हटाता है जैसे कि पलजर ए से दूसरे बर्तन में अपने डूबे हुए आयतन को बराबर b बर्तन में तरल द्रव्य को पहुंचा देता है दूसरे शब्दों में हटाए गए तरह द्रव्य का आयतन तरल द्रव्य में ठोस पदार्थ जितनी गहराई तक डूबा हुआ होता है वह उसके आयतन के बराबर होता है।
combination-protractor
surface-plate

Classification of reciprocating pump:-

रिसिप्रोकेटिंग पंप का वर्गीकरण दो प्रकार से किया जाता है
1. Steam driven reciprocating pump
2. Power driven reciprocating pump

1. Explain  Steam driven reciprocating pump:-

यह पंप निम्नलिखित प्रकार के होते हैं
  1. Direct acting pump
  2. Central or duplex pump
  3. Heavy duty pump
/calipers
1. Direct acting pump - 
इस पंप में एक स्टीम पिस्टन को पिस्टन रोड के साथ सीधे तरल द्रव्य पिस्टन से जोड़ दिया जाता है स्टीम सॉलि़ed वालव के द्वारा प्रवेश करती है हेवी पिस्टन को आगे मूव करती है जब सिस्टम अपना स्ट्रोक पूरा कर लेता है तो प्रयोग की हुई स्टीम एडजेस्ट वाल्व के द्वारा बाहर निकल जाती है तथा piston rivers ho जाता है इस प्रकार की यह प्रक्रिया चलाई जाती है।
2. Simple or duplex pump
Simplex टाइम में एक सटीम व पानी का सिलेंडर होता है और डुप्लेक्स पंप में दो स्टीम व दो पानी की सिलेंडर होते हैं।
3. Heavy duty reciprocating pump:-
यह पंप दो प्रकार के होते हैं पिस्टन टाइप स्टीम पंप और plunger ड्रिवन रेसि प्रोकेटिंग पंप 
पिस्टन टाइप स्टीम पंप में एक पीस टन में चार रिंग कास्ट आयरन के बने होते हैं इसे पैकेट पिस्टन के नाम से भी जाना जाता है किसी जगह पर पिस्टन ब्राउज़र धातु से भी बनाता है।
तथा 
plunger driven type reciprocating pump :-
इस पंप में एक ब्लेंडर सिलेंडर स्टेशनरी में मूव करता है और तरह डब्बे का दबाव बढ़ाने का कार्य करता है।

2. Power driven reciprocating pump

यह वह रेसीप्रोके टिंग पंप जो मोटर या इंजन द्वारा चलते हैं उन्हें पावर पंप या पावर ड्रिवन कहते हैं यह पंप लंबवत या होरिजेंटल दो प्रकार के होते हैं यह पंप क्रैंक शाफ्ट द्वारा चलाए जाते हैं क्रैंक शाफ्ट को मोटर या इंजन द्वारा ड्राइव मिलता है इस ड्राइव हुई गति के कम करने के लिए प्राय क्रैंक शाफ्ट व ड्राइव के बीच में गियर व पुली का प्रयोग किया जाता है पावर पंप अधिकतर होरिजेंटल एक्टिव पिस्टन या प्लाजर टाइप होते हैं वर्टिकल पंप सिंगल एक्टिंग टाइप होते हैं।

Follow our blog:-
www.bloggeryash.co.in

पावर ड्रिवन रिसिप्रोकेटिंग पंप के कार्य working of power driven reciprocating pump

जब किसी भी पंप को पहली बार स्टार्ट किया जाता है तो सबसे पहले उस पंप के तरल द्रव्य से प्राइम कर लेना चाहिए गियर व बियरिंग की लुब्रिकेंट अच्छी तरह से चेक कर लेनी चाहिए पंप की शिट अच्छी तरह से सुनिश्चित कर लेनी चाहिए कि पंप का डिस्चार्ज वलव  खुला है यदि ऐसा नहीं किया जाए तो पिस्टन बढ़ने के कारण नुकसान हो सकता है इस कठिनाई को दूर करने के लिए डिस्चार्ज लाइन में ऑटोमेटिक रिलीफ वाल्व का प्रयोग किया जाता है जब पंप स्टार्ट होता है तो पिस्टन मूव करता है तथा सिलेंडर में वैक्यूम बनाता है और वैक्यूम की वजह से तरल द्रव्य सक्शन साइड से चेंबर में आ जाता है फिर उसके बाद पिस्टन जब आगे की ओर मूव करता है उस समय पिस्टन तरल द्रव्य को  डिस्चार्ज वालव  के द्वारा बाहर धकेलता है रिवर्स स्टॉक में वही प्रक्रिया लगातार चलती रहती है और तरल द्रव्य सिलेंडर शक्शन चेंबर में आता रहता है और पिस्टन द्वारा आगे के स्ट्रोक को जब मुव करता है तो डिस्चार्ज बालव खुलकर द्रव्य को डिस्चार्ज करता रहता है।

Thanks for reading this blog



Saturday, December 8, 2018

Prime movers ,head and Priming

प्राइम मुवर क्या होता है what is prime mover?सक्शन हेड क्या है suction head, डिस्चार्ज हेड discharge head,स्टैटिक हेड static head, टोटल total head, प्राईमिंग what is priming?


प्राइम मूवर वह साधन है जिसके द्वारा किसी मशीनरी को चलाने के लिए ऊर्जा दी जाती है उसे प्राइम मूवर कहते हैं या प्राइम मूवर वह साधन है जिसके द्वारा पंप को चलाने के लिए ऊर्जा या शक्ति दी जाती है उसे प्राइम मूवर कहते हैं प्राइम मूवर के प्रकार:-
डीजल इंजन, पेट्रोल इंजन ,टरबाइन ,बिजली की मात्रा आदि।

Calipers

सेक्शन हैड या स्टेटिक हैड क्या है? What is section head or static head?

पंप की केंद्र लाइन से लेकर सक्शन टैंक में तरल द्रव्य की लेबल के बीच की लंबवत दूरी को सक्शन हेड और स्टैटिक हेड कहते हैं।

डिस्चार्ज हैड या स्टैटिक डिस्चार्ज हेड क्या है? What is discharge head or static discharge head?

पंप की केंद्र लाइन से लेकर डिस्चार्ज टैंक में तरल द्रव्य की लेवल या स्तह के बीच की लंबवत दूरी को डिस्चार्ज हेड या स्टैटिक डिस्चार्ज हैड कहते हैं।
Surface plate

टोटल हेड क्या है What is total head?

Suction tank में तरल द्रव्य की लेवल से लेकर डिस्चार्ज टैंक में तरल द्रव्य की लेबल के बीच की लंबवत दूरी व घर्षण द्वारा हानियों के योग को स्टैटिक हैड या टोटल हेड कहते हैं।

प्राईमिंग क्या है? प्राईमिंग कैसे की जाती है what is priming and method of priming

पंप केसिंग तथा सक्शन सिस्टम में से उपस्थित हवा को बाहर निकालने की प्रक्रिया को प्राईमिंग कहते हैं।
प्राईमिंग के मेथड: तरल द्रव या भरकर के ट्रेनिंग करना
Vacuum pump के द्वारा प्राईमिंग करना।
फुटबॉल व द्वारा ट्रेनिंग करना।
पंप का सेल्फ प्राईमिंग होना।

Combination set, protector

प्राईमिंग कैसे की जाती है method of priming

  1. तरल द्रव्य द्वारा प्राईमिंग करना:- तरल द्रव्य को पंप केसिंग तथा सक्शन पाइप में उस समय तक करते हैं जब तक पंप के अंदर तथा सक्शन  सिस्टम के उपस्थित हवा भी भरी हुई है वह एयर पुली से बाहर निकल जाए हवा बाहर से केंद्र के बाद तरल द्रव्य वहां से स्मूथ रूप से बाहर निकलना शुरू ना हो।
  2. वेक्यूम पंप द्वारा प्राईमिंग करना:- इस प्रकार की सक्शन पाइप में वेक्यूम पंप के द्वारा सक्शन पाइप व के सींग के बीच से हवा को बाहर निकालना चाहिए।
  3. फुटबॉलब द्वारा प्राईमिंग करना:- फुटबॉल सक्शन पाइप के मुंह के ऊपर फिट किया जाता है जब पंप को बंद कर दिया जाता है तो फुटबॉल फ्लैप अपने स्थान पर बैठ जाती है और तरल द्रव्य के बैकफ्लो को रोक देती है और सक्शन पाइप तथा पंप केसिंग के बीच में तरल द्रव्य भरा हुआ रह जाता है और हवा अंदर नहीं आ सकती इस प्रकार के कार्य के लिए फुटबॉलब को फिट किया जाता है जिसे बार-बार प्राईमिंग की आवश्यकता नहीं पड़ती।
  4. पंप का सेल्फ प्राईमिंग होना:- इस प्रकार के पंप को जब फिट किया जाता है तो उसी समय है उसे प्राईमिंग की जाती है बार-बार प्राईमिंग की आवश्यकता नहीं पड़ती क्योंकि यह पंप पानी को पूरी तरह से बाहर डिस्चार्ज नहीं करता जब पंप को बंद किया जाता है तब यह पंप अपने अंदर तरल द्रव्य को छोड़ देता है द्रव्य होने के कारण हवा अंदर नहीं आती और प्राईमिंग की आवश्यकता नहीं पड़ती इसलिए इस प्रकार के पंप को सेल्फ प्राईमिंग पंप कहते हैं।
Follow our blog:- www.bloggeryash.co.in

Thanks for watching this blog


Thursday, December 6, 2018

Pumps

पंप का परिचय (Introduction of pump)   पंप के प्रकार  (types of pump)                    पंप के उद्देश्य (motive of pump )               पंप के कार्य (working of pump)


पंप का प्रयोग कारखानों में बहुत ही महत्वपूर्ण है पंप से विभिन्न विभिन्न प्रकार के तरल द्रव्य को दबाव के अंदर पहुंचाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है पंप का प्रयोग निम्नलिखित जगह पर किया जाता है पावर प्लांट ,केमिकल इंडस्ट्री एंड ऑयल वेल एंड वाटर सप्लाई ।पंप का प्रयोग अलग-अलग जगहों पर डिस्चार्ज कर के तरल द्रव्य को बड़े हुए दबाव के अंदर पहुंचाने के लिए किया जाता है तथा विभिन्न स्थानों से द्रव्य को को उठाने के लिए किया जाता है।

Centrifugal pump

पंप क्या हैWhat is pump ?or पंप की परिभाषा definition of pump:-

पंप वह साधन है जो कि तरल द्रव्य को विभिन्न विभिन्न ऊंचाइयों तक बढ़े हुए दबाव के अंदर पहुंचाने के लिए जिम्मेदार होता है।
                        या     Or
पंप एक यांत्रिक साधन है जो एक पाइपलाइन सिस्टम में फिट किया जाता है तो यह किसी बाहरी स्त्रोत से ली हुई ऊर्जा से अपने अंदर रहने वाले द्रव्य को दबाव के अंदर स्थानांतरित करता है उसे पंप कहते हैं।

पंप के कार्य working of pumps :- 
  1. तरल द्रव्य को उठाना।
  2.  तरल द्रव्य को सर्कुलेट करना।
  3.  तरल द्रव्य का दबाव उठाना ।
  4. तरल  द्रव्य को गतिज ऊर्जा देना।
  5.  तरल द्रव्य को फेंकना।
पंप का वर्गीकरण classification of pumps
पंप का वर्गीकरण डिजाइन के अनुसार दो प्रकार से होता है
1. Dynamic pump 
2. displacement pump

1. Dynamic pump:- 
                                  डायनामिक पंप वे पंप होते हैं जिसमें की तरल पदार्थ की गति बढ़ाने के लिए लगातार ऊर्जा दी जाती है जैसे सेंट्रीफ्यूगल पंप।
2. Displacement pump :-
                                    Displacement pump वह पंप होते हैं जिसमें की तरल द्रव्य को उठाने के लिए कभी-कभी ऊर्जा दी जाती है जैसे रेसिप्रोकेटिंग पंप।

पंप के उद्देश्य main motive of pumps

पंप की आवश्यकता को निम्नलिखित परिस्थितियों में सप्लाई करने के लिए पड़ती है:-
  1. जहां तरल द्रव्य चाहिए वहां पर ऊंचा स्थान होने के कारण पंप की आवश्यकता पड़ती है।
  2. जहां पर सप्लाई या सिस्टम में दबाव की ज्यादा आवश्यकता पड़ती है वहां पर पंप लगाए जाते हैं।
  3. जिस स्थान पर तरल द्रव्य की लेवल को एक जगह से दूसरी जगह तक उठाया जाता है।
  4. गांव और शहरों में पीने का पानी, सिंचाई का पानी ले जाने के लिए हवाई जहाज समुद्री जहाज में विभिन्न उद्देश्यों के लिए विभिन्न प्रकार के पंपों को बड़े पैमाने पर प्रयोग किया जाता है।

पंप के प्रकार types of pump

पंपू के प्रकार प्रयोग के अनुसार अलग-अलग जगहों पर किए जाते हैं जो कि निम्नलिखित प्रकार से है:-
  1. Centrifugal pump 
  2. submersible pump
  3.  gear pump
  4.  reciprocating pump
  5.  screw pump 
  6. piston pump 
  7. helical pump 
  8. air lift pump 
  9. propeller pump 
  10. defreshial pump 
  11. jet pump 
  12. lov rotor pump 
  13. hand pump 
  14. turbine pump 
  15. hydrum pump
  16.  gas pump 
  17. vane pump 
  18. single and double acting pump
  19.  special pump etc..



Tuesday, December 4, 2018

Bearing

वीयरिंग का परिचय Introduction of Bearing वीयरींग के प्रकार Types of Bearing  अच्छे वीयरींग की विशेषता Quality of good bearing वीयरींग फिट करना Method of Fitting वीयरींग लुब्रिकेंट Bearing Lubricant सुरक्षा सावधानियां Precautions

वर्कशॉप में पावर को परेशीत या ट्रासमीट करने के लिए मुख्य माध्यम शाफ्ट है। शाफ्ट के ऊपर ही कार्य के अनुसार पुली ,गियर ,कपलिंग और कैम आदि को फिट करके पावर को ट्रांसमीट कर दिया जाता है शाफ्ट को प्रयोग में लाते समय जिस माध्यम के द्वारा इसे पकड़ा जाता है या सहारा दिया जाता है उसे बियरिंग कहते हैं अतः मशीन या किसी उपकरण के घूमते हुए भाग को सहारा देने की अवस्था को बियरिंग कहते हैं इनके उपयोग से शाफ्ट एवं अन्य उपकरणों के घूमने वाले भाग सुगमता से स्वतंत्रता पूर्वक घूमते हैं बियरिंग के मुख्य उपयोग निम्न लिखित है:-

  1. शाफ्ट को सहारा देना।
  2. शाफ्ट को पकड़ना और गाइड करना ।
  3. गति के समय शाफ्ट की रगड़ से उत्पन्न हुई गर्मी को कम करना।
  4. स्मूथ एवं स्वतंत्र गति देते हुए पावर की बचत करना।

अच्छी बियरिंग की विशेषता quality of good bearing

  1. शाफ्ट के लिए आधार देने योग्य होनी चाहिए।
  2. घर्षण को कम करने वाली होनी चाहिए।
  3. शाफ्ट को सही स्थिति में है रखते हुए भार के विपरीत करने वाली होनी चाहिए।
  4. गति अधिक होने पर पार्ट को स्मूथ से घुमाने वाली होनी चाहिए।
  5. झटके व कंपन आदि को सहन करने वाली होनी चाहिए।
  6. अधिक गति पर घूमते हुए कम पावर वीयर करने वाली होनी चाहिए।
  7. कार्य की गति के लिए अवरोध ना करने वाली होनी चाहिए।

वीयरींग के प्रकार types of bearing

बियरिंग आकार, भार तथा डिजाइन के अनुसार कई प्रकार की होती है जिनमें मुख्यतः निम्न लिखित होते हैं:-
  1. आकार के अनुसार:- आकार केेे अनुसार वीयरींग को दो भागों में बांटा जाता है     1. चपटी वीयरींग ।                   2.   बेलनाकार वीयरींग
  2. भार के अनुसार:-            1.  अभिव्यक्त वीयरींग ।             2. पाद वीयरींग                3.  प्रणोद वीयरींग
  3. घर्षण के अनुसार:- घर्षण के अनुसार बियरिंग को दो भागों में बांटा जाता है
    1.घर्षण वीयरींग
    2. घर्षण रोधी वीयरींग 

वीयरींग किस धातु से बनाए जाते हैं

घर्षण bearing प्राय nonferrous धातु से बनाया जाता है जिनमें मुख्यतः निम्न लिखित है:-
पीतल, गन मेटल, कांसा, फास्फर, मैगनिज, श्वेत धातू, वेबिट धातु।

वियरींग को फिट करने की विधि 

  1. बियरिंग फिट करने से पहले शाफ्ट के व्यास में अलाउंस रखना चाहिए।
  2. छोटी माप वाली बियरिंग को शाफ्ट पर ड्राइव फिट करने के बाद फिर हाउसिंग को फोरस फिट करें।
  3. बड़ी माप वाली बियरिंग को सबसे पहले हाउसिंग में फिट करके फिर शाफ्ट के अलाइनमेंट में रखना चाहिए।
  4. bearing को फिट करते समय मुलायम हैमर का प्रयोग या रबड़ हैमर का प्रयोग करना चाहिए।
  5. लंबी और पतली शाफ्ट में तीन बियरिंग लगाएं बड़े साइज की शाफ्ट में दो बीयरींग  लगाने चाहिए।
  6. स्पीड व भार के अनुसार बेयरींग  का चुनाव करना चाहिए।

बियरिंग का लुब्रिकेशन lubrication of bearing

lubrication वीयरींग के भार व स्पीड पर निर्भर करते हैं अर्थात अधिक स्पीड पर मोटर लुब्रिकेंट जैसे ग्रीस और कम स्पीड पर पहला लुब्रिकेंट मुवलेल  का प्रयोग करते हैं लाभ यह है कि इस तरह के लुब्रिकेंट होने से घर्षण कम उत्पन्न होती है तथा गति में बढ़ावा  मिलता है तथा भाग आपस में कम घीसते हैं प्राय बियरिंग में ऑयल रिंग सिस्टम (oil ring system)तथा ग्रुव फोरस सिस्टम(grove force system) प्रयोग किए जाते हैं।

बियरिंग को लगाते समय बरती जाने वाली सुरक्षा सावधानियां

  1. जहां बियरिंग फिट करनी हो वह स्थान लेवल में जांच लेना चाहिए।
  2. बियरिंग को फिट करते समय उचित अलाइनमेंट व  परीशुद्धता से जांच लेनी चाहिए।
  3. बियरिंग का लुब्रिकेंट समय समय पर जांचते रहना चाहिए।
  4. बियरिंग को फिट करते समय नरम धातु के हैमर का प्रयोग करना चाहिए।
  5. बियरिंग को फिट करने से पहले शाफ्ट व हाउसिंग के नाप की जांच करनी चाहिए।

Sunday, December 2, 2018

विद्युत का संचालन power transmission

विद्युत संचारण का परिचय Introduction of power transmission

लगभग सभी कारखानों  में चाहे वह बड़े हो या छोटे मशीन प्रयोग की जाती है इन्हें चलाने के लिए पावर की आवश्यकता होती है मशीन को चलाने अर्थात उन्हें वांछित गति देने के लिए पावर  अलग अलग ढंग से दिया जाता है और मशीन या उसके भाग के चलाने के ढंग चाहे जैसे भी हो परंतु प्रारंभ में पावर घुरण ऊर्जा रोटरीन उर्जा के रूप में ही दी जाती है मशीन को यह प्रारंभिक पावर विद्युत मोटर से मिलती है इस मोटर का यह कार्य होता है कि विद्युत ऊर्जा को प्राप्त करके उसे घुरण ऊर्जा में बदल देती है जो कि घीर्णीयों व पट्टा चालन चेन चालन द्वारा मशीन तक प्रेषित कर दी जाती है।

संचारण के साधन

पूरी पट्टा ,रही,चेन ड्राइव,गीयर ड्राइव, तथा  घर्षण चालन,क्लच चालन आदि।

You can read my another blogs:-
Micrometers
Surface plate

Pulley Bolt rope and chain drive:- कारखानों में पावर या  घूर्णन गति रोटरी मूवमेंट का एक  शाफट दूसरे  शाफट तक संचालन रस्सी ,पट्टटा,  चेन या गीयर द्वारा किया जाता है पट्टा,रस्सी , चेन या गियर एक शाफट को दूसरे शाफट से जोड़ते हैं अतः इन्हेंं संयोजक  कहतेे हैं।रस्सी ,पट्टा द्वाार  पावर का  संचााााणर संयोजक व पुली के मध्य घर्ष्ष्ष्ष्षण के कारण होता है।
विद्युत या गति उपलब्ध होने वाले स्थान पर अलग-अलग तरह से चांदन के लिए एक अलग अलग तरीके हैं जिसमें विद्युत को संचालन किया जाता है। चालन दो प्रकार के होते हैं
1 सीधा पट्टा चालन
2 तिरछा पट्टा चालन

Vernier Calipers

Types of Belts:- 
  1. चमड़े की बेल्ट 
  2. कपड़े की बेल्ट
  3.  रबड़ का पट्टा 
  4. नायलॉन पट्टा 
  5. V पट्टा
पुली के प्रकार:- 
  • ठोस पुली
  •  स्प्लिट पुली
  • step Pulley 
  • V groove Pulley
  •  Chian or rope pulley
  •  loose and fast pulley
  • Jack pulley

https://www.bloggeryash.co.in

Thanks for reading this blog



Friday, November 30, 2018

Looking Device

लाॅकिंग डीवाइस क्या है What is the Loking Device? इनके कार्य और प्रकार 


Screw:- अस्थाई बंधन के लिए नट एवं बोल्ट की ही तरह से ही स्क्रु का भी प्रयोग किया जाता है इनके सिरे पर हेड बना होता है और शीर्ष की पूरी देह पर चूड़ियां कटी होती है पराया हेड में कटे खांचे  पेशकश के प्रयोग से इन्हें उपयोग में लाए जाते हैं ।8 सोकेट हैंड स्क्रु  के द्वारा प्रयोग में लेते हैं स्क्रू प्राय  माइल्ड स्टील के बनाए जाते हैं परंतु कार्य के अनुसार कार्बन स्टील, पीतल एवं एलुमिनियम के स्क्रू भी पाए जाते हैं लकड़ी के कार्य में प्रयोग किए जाने वाले स्क्रु को डूड स्क्रु (dood screw) तथा फेरस मेटल तथा नॉन फेरस मेटल धातु में प्रयोग किए जाने जाने वाले पेचों को मशीन स्क्रु कहते हैं ।मशीन स्क्रु के हैड और चूड़ी वाले लाभ के बीच में थोड़ी सी बोरिंग सरफेस रखे जाते हैं जिस पर चूड़ियां नहीं बनी होती। इनका व्यास चूड़ियों के मेजर व्यास से पिच डायमीटर से अधिक होता है ऐसे स्क्रु का प्रयोग प्राय मशीन के पार्ट का अस्थाई रूप से मिलाने के लिए किया जाता है कार्य के अनुसार यह कई प्रकार के खांचे द्वारा शीर्ष में पाए जाते हैं screw मुख्यत निम्नलिखित प्रकार के होते हैं:-

  1. Cap screw 
  2. colours screw 
  3. shoulder screw
  4.  set screw

बोल्ट Bolt 

यह एक गोल छेद का बना होता है जिसकी एक सिरे पर स्थाई शीर्ष वह दूसरे सिरे पर चूड़ियां कटी होती है जिन पर नट को कस सकते हैं हेड व चूड़ी वाले भाग को शंक कहते हैं यह मुख्यतः माइल्ड स्टील के बने होते हैं परंतु कुछ विशेष कार्य के लिए पीतल तांबे व हल्के लोहे के बने होते हैं इनका साइज चूड़ी वाले भाग के व्यास एवं हैड को छोड़कर शेष लंबाई से प्रकट कर लिया जाता है हैड के विचार से बोल्ट कई प्रकार के होते हैं जैसे hacksaw nut head bolt, square head bolt, round head bolt, T head bolt, counter sunk bolt, hook bolt, I bolt. Etc.

Foundation Bolt

उपयोग किए जाने वाले कुछ और बोल्ट होते हैं जिन्हें फाउंडेशन बोल्ट कहते हैं इनके द्वारा मशीन को भूमि तान पर फिक्स किया जाता है यह फाउंडेशन बोल्ट कई प्रकार के होते हैं जैसे आई फाउंडेशन बोल्ट ,रेंज फाउंडेशन बोल्ट ,काउंटर बोल्ट।

नट क्या है What is Nut? नट के प्रकार Types of nuts :- 

यह चूड़ीदार छेद वाला धातुु का एक टुकड़ा होता हैै जिससे Bolt या stud चूड़ीदार वाले सिरे सेे कसा या चढ़ाया जाता है।नट और बोल्ट की सहायता से दो भागों को जोड़़ दिया जाता है और आवश्यकता पड़ने पर बड़ी आसानी से अलग कर दिया जाता है। अलग करते समय न तो जुड़े हुए पार्ट खराब होते हैं और न ही नट व बोल्ट बना वट के अनुसार नट केइ प्रकार के होते हैं जैसे - haction nut, square nut,  cup nut, domo nut, castle nut, ring nut, big nut,.

What is lock nut ? Or check nut

इसका इस्तेमाल हमेशा साधारण स्टैंडर्ड नट के साथ किया जाता है स्टैंडर्ड नट को कस के ऊपर से लाॅक  नट कस देने पर स्टैंडर्ड नट ढीला नहीं होता है यह चेक नट भी हैक्सा गोल्ड नट ही होता है जिसकी ऊपर नीचे के दोनों साइड चैंफर  की हुई होती है। सर्वप्रथम standard नट को बोल्ट पर जितना टाइट हो सकता है उतना टाईट कर दिया जाता है  फिर चेक नट को उसके ऊपर से कसा जाता है कि चैक नट का निचला भाग स्टैंडर्ड नेट के ऊपरी भाग से सट जाए अंत में चेक नेट को एक स्पिनर से पकड़ कर दूसरे स्पिनर से स्टैंडर्ड नट को पीछे की ओर धक्का दिया जाता है इस तरह दोनों नट एक दूसरे के लिए या बोल्ट के लिए लॉक हो जाते हैं यह सटेन्डर नट को ढीला नहीं होने देते चेक नेट को नीचे एवं स्टैंडर्ड को ऊपर भी लगाया जा सकता है।
Castle nut:- नट के ऊपर कॉलर में स्लॉट्स खांंेच कटे होते हैंं अतः स्लॉटेड नट की अपेक्षा यह मजबूत होता हैैै ब्लॉकिंग अरेंजमेंटग के इसका  प्रयोग भी स्लाइटेड के समान ही समान ही पीन के साथ किया जाता है।
Split Pin :- यह अर्ध गोलाकााार क्रॉस सेक्शन के स्टील  के तार को मुड़ कर बनाई जाती है यह बोल्ट में इस प्रकार के छेद करके फिट की जाती हैै कि नट की उपरी  सतह  पर  इस तरह से सटी रे। इस तरह यह नेट को घूमने और ढीलाा होने नहीं देेीत।
Spring washer:-  spring washer या lock washer लगाकर नट को कस देने पर भी वह ढीला नहीं होता है।
स्टड (stud) :- यह गोलाकार धातु के 30 से बनाए जाते हैं जिनके दोनों सिरों पर चूड़ियां बनी होती है और बीच का भाग कार्य के लिए किया जाता है बीच का भाग गोलिया चकोर होता है। stud का  प्रयोग प्राय टेंम्परेरी  Fasting करने के लिए किया जाता है।
स्टड दो प्रकार के होते हैं:-

  1.  प्लेन स्टड :- यह stud  गोलाकार  धातु की छड से बनाया जाता है जिसके दोनों सिरों पर चूड़ियां बनाई जाती है और बीच का भाग प्लेन रखा जाता है इसका प्रयोग प्राय साधारण कार्य के लिए किया जाता है।
  2. सोडर स्टड :- यह प्लेन स्टड की तरह होता है अंतर केवल इतना होता है कि इसमें एक कंघा बना होता है इसके दांतों पर पर चुडीयां बनी होती है इसी कारण यह स्टड पार्ट की सरफेस पर अच्छी तरह से बैठ जाता है।

Thanks for reading this blog






Wednesday, November 28, 2018

Spanner

स्पैनर क्या है What is Spannar? इसके करता कार्य है what is its work? And स्पैनर के प्रकार types of spanners :-

दो या दो से अधिक बालों को अस्थाई रूप से जोड़ने के लिए हराया नट और बोल्ट का प्रयोग किया जाता है जो ट्यून इन नट और बोल्ट कसने या खोलने के लिए प्रयोग किया जाता है उसे स्पिनर या रिंच कहते हैं आम भाषा में इन्हें पन्ना या चाबी भी कहते हैं यह कार्बन स्टील के कोर्स करके बनाए जाते हैं इन्हें हार्ड एवं टेंपर कर लिया जाता है नटवा बोल्ट के आकार व साइज विभिन्न विभिन्न होने के कारण स्पिनर या रेंज कई प्रकार के होते हैं जो निम्नलिखित प्रकार के हैं:-
https://www.bloggeryash.co.in/2018/10/calipers.html
  1. Spanner set (single ended spanner double ended spanner)
  2. close ended spanner 
  3. ring spanner
  4.  adjustable spanner
  5.  monkey spanner
  6.  wrench lever jaw
  7.  pin hook spanner 
  8. adjustable hook spanner 
  9. adjustable pin phase spanner 
  10.  T stock wrench
  11.  offset socket spanner
  12.  ratchet wrench 
  13. combination spanner 
  14. align key
  15.  tool post spaannr
  16.  tubler box spanner
  17. Pipe wrench spanner
  18. Chain wrench spanner
  19. Strap wrench spanner

limitfits-tollerance


कार्य करते समय बरती जाने वाली सुरक्षा सावधानियां Precautions to be used with working

  1. नट और बोल्ट के शीर्ष पर रेंच्च या स्पेनर ठीक से फिट होना चाहिए।
  2. कार्य करते समय रेंच्च के फिसलने के कारण चोट भी लग सकती है।
  3. स्पेनर या रेंच्च पर आवश्यकता से अधिक ताकत नहीं लगानी चाहिए।
  4.  अधिक कसे हुए नट व बोल्ट को रेंच्च का झटका देकर खोला जा सकता है अधिक लीवर क्षमता प्राप्त करने के लिए हत्थे में पाइप लगा दिया जाता है इससे कम बल लगाने से ही काम हो जाता है ‌।
  5. रिच्च  का प्रयोग कभी भी हैमर की तरह से नहीं करना चाहिए।
  6. समयोजक स्पिनर का प्रयोग करते समय समायोजन जबड़े को उस तरफ रखना चाहिए कि धरबल  लगाया जा रहा हो।
  7.  समायोजक स्पैनर तथा बंदर रेंच को इस प्रकार से सेट करना चाहिए कि नट एंड बोल्ट के शीर्ष पर ठीक से फिट हो सके।
  8. नट व बोल्ट को खोलते समय यदि स्पैनर बड़े साइज का हो तो कभी भी हेक्सा ब्लेड के टुकड़े या दूसरी पति की पैकिंग नहीं करनी चाहिए।
  9. जंग लगे हुए पुराने नट बोल्ट को खोलने से पहले इन्हें मिट्टी के तेल पर इन्हें तर कर लेना चाहिए।
  10.  स्पैनर के मुंह और हत्थे पर चिकनाई नहीं लगनी चाहिए।


Thanks for reading this blog


Monday, November 26, 2018

Screw driver

पेचकस क्या है What is Screw driver? और यह केसे कार्य करता है ।And how to work with it. स्क्रु ड्राइवर के प्रकार  Types of screw driver.

वर्कशॉप में कार्य करते समय कारीगर को कई प्रकार के जॉब बनाने पड़ते हैं कई ऐसे कार्य होते हैं जिनको विभिन्न विभिन्न साधनों द्वारा आपस में जोड़ा जाता है जैसे कभी कभी किसी नट बोल्ट को कसना या ढीला करना पड़ता है तो कभी किसी पेच के कसने वह खोलने की आवश्यकता पड़ती है इस प्रकार जीस टूल  से किसी पेच को कसा या ढीला किया जाता है उसे पेचकस या स्क्रुड्राइवर कहते हैं।
Screw drivers
https://www.bloggeryash.co.in/p/iti-students.html

 हत्था  सेंक तथा ब्लेड इसके मुख्य भाग होते हैं इसका साइज इसकी लंबाई से प्रकट किया जाता है वह कार्य के अनुसार 75mm से 300mm तथा और भी अधिक साइज में मिलते हैं स्क्रू ड्राइवर की सेंक हाई कार्बन स्टील की बनी होती है तथा इसके ब्लेड को हारड एवं टेंपर कर लिया जाता है ऑफसेट स्क्रू ड्राइवर को छोड़कर प्राय स्क्रू ड्राइवर के हत्थे कठोर लकड़ी या प्लास्टिक के बनाए जाते हैं।

स्क्रु ड्राइवर के प्रकार  (Types of screw driver )

  1. मानक पेचकस:- इस प्रकार का स्क्रू ड्राइवर गोलाकार के छड से चपटा करके बनाया जाता है व इसकी दूसरी सिरे पर आवश्यकतानुसार हत्था फिट किया जाता है इसका प्रयोग सामान्यतः सभी कार्यों के लिए किया जाता है यह विभिन्न साइज का होता है इसका ब्लेड स्क्रू के स्लाट में ठीक से बैठना चाहिए यह भी दो प्रकार के होते हैं हल्के एवं भारी कार्यों के अनुसार भारी कार्य स्क्रुड्राइवर की सेंक प्राय मोटे  चकोर के प्रकार की होती है जिसे आगे से चपटा कर दिया जाता है यह पेचकश दूसरे प्रकार के पेचकसों की  अपेक्षा बड़े साइज का होता है इसका प्रयोग बड़े कार्यों के लिए किया जाता है।
  2. Phillips screw driver:- इस प्रकार के स्क्रू ड्राइवर के बुलेट पर चार नालियां कटी होती है जोकि फिलीप वाले स्क्रु साइज के अनुसार फिट हो जाता है इसलिए स्क्रू ड्राइवर का प्रयोग प्रायर फिलिप्स हेड वाले स्क्रु को खोलने कसने के लिए किया जाता है इनका साइज संख्या से बताया जाता है जैसे 0,1,1 1/2,2,3 है।
  3. off set screw driver:- दोनों सिरों के एक दूसरे एक  विपरीत के कोण पर मोड़ कर बनाया जाता है इसका प्रयोग तंग स्थानों या अन्य स्थानों में किया जाता है जहां मानक या स्क्रुड्राइवर का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
  4. ratchet screwdriver :- इसमें रैचेट गति करता है एक बटन के द्वारा जिसे विस्थापन कहते हैं इसे इसकी चाल को बदला जा सकता है विस्थापितों को ऊपर खींच लेने पर बुलेट सिर्फ बाएं तरफ घूम सकता है इसका प्रयोग स्क्रु को जल्दी खोलने तथा चढ़ाने के लिए किया जाता है।
  5. managing screw driver:- यह पेचकश पॉकेट पेचकश भी कहलाता है।
  6. watch size screw driver:- ये स्क्रु ड्राइवर घड़ियां और दूसरे इंस्ट्रूमेंट की मरम्मत करने के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं इनका साइज जीरो नंबर से पांच नंबर होता है 0 बहुत कम तथा 5 सबसे मोटा होता है।

स्क्रू ड्राइवर का प्रयोग करते समय बरती जाने वाली सुरक्षा सावधानियां

  1. screwdriver  की नोंक की चौड़ाई स्क्रु हैड में कटे खांचे से थोड़ी सी कम होनी चाहिए।
  2. नोंक को कभी भी चाकू की तरह तेज धार वाले ग्रैंड नहीं करनी चाहिए कि से सीधा टेपर ग्राइंड करना चाहिए।
  3. टूटे व फटे हुए हत्थे तथा मुड़े हुए सेंक के स्क्रू ड्राइवर को प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  4. screwdriver पर कभी भी हैमर की चोट नहीं मारनी चाहिए।
  5. किसी भी जॉब को हाथ में पकड़ कर उसमें लगे स्क्रू को स्क्रुड्राइवर से खोलना या कसना नहीं चाहिए क्योंकि स्क्रुड्राइवर फिसलकर हाथों में लग सकता है।
  6. स्क्रुड्राइवर का इस्तेमाल कभी भी छीनी या पंच की तरह नहीं करना चाहिए।
Follow us:-
Thanks for reading this blog

Wednesday, November 21, 2018

Pliers

प्लायर क्या है  What is Pleirs ? प्लायर कैसे कार्य करता है। How it work and और प्लायर के प्रकार types of pliers

प्लास वह  औजार है जो छोटे-छोटे जॉब या वस्तु को पकड़ने, काटने एवं मोड़ने के काम आता है यह मुख्यतः माइल्ड स्टील से बनाया जाता है हत्था, रिबेट एवं जबड़ा इसके मुख्य भाग होते हैं इसके जबड़े कठोर एवं टैंपर  किए होते हैं प्लायर का साइज इसकी लंबाई से प्रकट किया जाता है काम एवं आकार के अनुसार प्लास कई प्रकार के होते हैं।

Types of Pleirs

What is file

How is the work with try square

प्लास के प्रकार Types Typ of Pleirs

  1. Side cutting Pleirs:- इसे चपटी नाक प्लास या लाइनमैन का साइड कटिंग  प्लायर भी कहते हैं इसके दो     जबड़ों के बीच में कटिंग ऐज बनी होती है जिससे तार को काटा जा सकता है इससे पहले तार को पकड़ा मोड़ा व काटा जा सकता है बिजली विभाग में प्रयोग होने वाले प्लास के हाथे पर रबड़ का कवर चढ़ा रहता है लाइनमैन इसका प्रयोग करते हैं।
  2. Long nose Pliers:- इस प्रकार के प्लास के जबड़े लंबे और आगे नुकीले होते हैं इसका प्रयोग प्राय उन तंग स्थानों में छोटे हिस्सों को पकड़ने निकालने व फिट करने के लिए किया जाता है जहां पर दूसरे प्लायर का जबड़ा घुम नहीं सकता बिजली एवं रेडियो मेकेनिक  इसे अधिक प्रयोग करते हैं इसके जबड़ों में भी करतन धार होती है जिससे तार को काटा जा सकता है।
  3. विकरणीय  प्रवास Diagonal Pleirs:- इस प्रकार के प्लायर का प्रयोग प्राय बिजली के मैकेनिक द्वारा बिजली के तारों को काटने और सिलने के लिए किया जाता है इसमें पकड़ने वाला जबड़ा नहीं होता है इसे वायर कटिंग प्लायर भी कहते हैं।
  4. Slip Joint Pleirs:- इस प्रकार प्लास के जबड़े के स्लीप ज्वाइंड की सहायता से अधिक चौड़ाई में खोला जा सकता है और एक या एक से अधिक साइज के लिए सेट कर के छोटे और बड़े साइज के कार्य को पकड़ा जा सकता है। इसके जबड़ों में कर्तनधार भी बनी होती है जिसमें तार को काटा जा सकता है इस प्लायर का मुख्  चपटा होता है और इसका प्रयोग चपटे जॉब को पकड़ने के लिए किया जाता है इस के जबड़े की स्तह  बीच में गोल आकार की होती है जिस पर दांत बने होते हैं अतः हिस्से में गोल जॉब को मजबूती से पकड़ा जा सकता है।
  5. Pincers Pleirs :- इसके दोनों जौ गोलाई में थोड़े से अंदर की ओर मुड़े होते हैं इनकी एक टांग पीछे से चपटी होती है और खांचा रखती है जिसमें कील के एक सिरे को ऊपर उठाते हैं इसका प्रयोग लकड़ी से कील निकालने के लिए किया जाता है इसे जंबूर भी कहते हैं।
  6. Multi Group Pleirs :- इस प्लायर को पानी के बीच का प्रदार्थ भी कहते हैं जिसे 0 से 50 एमएम के बीच 7 साइज में सेट कर सकते हैं।

Why want any job tolerance

प्लायर का प्रयोग करते समय बरती जाने वाली सुरक्षा सावधानियां precautions to be used during the work with Pleirs

  1. प्लायर को कभी भी स्पेनर या रीन्च की तरह प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  2. तार को काटते समय तार का शीरा नीचे की ओर होना चाहिए सिरा अपनी ओर होने से तार का कटा भाग कारीगर को चोट पहुंचा सकता है।
  3. कार्य के अनुसार प्लास का प्रयोग करना चाहिए अन्यथा इसके जौ खराब हो सकते हैं।
  4. प्लायर का प्रयोग कभी भी हैमर की जगह नहीं करना चाहिए।
  5. बिजली का कार्य करते समय बिना इंसुलेशन के प्लायर का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
  6. कार्य करते समय प्लायर के ऊपर तेल, ग्रीस आदि नहीं लगी होनी चाहिए नहीं तो स्लीप करके चोट पहुंच सकती है।

Thanks for reading this blog

Monday, November 19, 2018

Scrapers and keyway

स्क्रेपर क्या है What is scraper? स्क्रेपर के प्रकार  Types of scraper? विधी Mathod of scraping and सुरक्षा सावधानियां precautions to be used

कीवे क्या है What is key or keyway?


मशीन के कुछ पार्ट  ऐसे होते हैं जिनकी सरफेस को अधिक शुद्धता में बनाना पड़ता है चाहे वह सरफेस भीतरी हो या बाहरी इन पार्ट को जब फिलिंग, मशीनिंग, ग्राइंडिंग क्रियाओं के द्वारा बनाया जाता है तो इनकी सरफेस पर कुछ नीचे दबे रह जाते हैं जो कि साधारण से आंखों से दिखाई नहीं पड़ते यदि इन ऊंचे धब्बों को ना हटाया जाए तो यह मशीन की चाल में कुछ रुकावट डाल सकते हैं इसलिए पार्ट्स को व मशीन को खराब  होने से बचाने के लिए स्क्रैपर के द्वारा उन दोनों को निकाला जाता है स्क्रैपर प्राय  टूल स्टील से बनाए जाते हैं और इनकी कर्तन धार को हार्ड एवं टेंपर कर दिया जाता है प्रयोग की आवश्यकता के अनुसार इन्हें विभिन्न आकृतियों एवं आकारों में बनाया जाता है तथा इनकी कुछ प्रमुख किस्में निम्नलिखित प्रकार की होती है:-

Scrapers


  1. Flate scraper
  2. Hook scraper
  3. Traingular scraper
  4. Half round scraper
  5. Double Handle scraper

स्क्रेपींग करने की विधि (Mathod of scraping)

स्क्रैपर का प्रयोग बहुत ही बारीक कमियों को दूर करने के लिए किया जाता है जबकि अर्थात चौरस सतहों  कि स्क्रैपर करते समय  उस सतह के ऊंचे धब्बों को प्राप्त करने के लिए सरफेस प्लेट की सहायता ली जाती है पहले सरफेस प्लेट पर सिंदुर या नील की बहुत पतली परत उंगलियों के सहारे चढ़ा देनी चाहिए फिर जॉब की स्क्रेपर की जाने वाली सतह को सरफेस प्लेट को ही उस पर रखना चाहिए यदि जॉब बहुत भारी हो तो सरफेस प्लेट को ही उस पर रखना चाहिए। रगडने  के बाद जॉब की सतह पर जहां-जहां रंग लगे वह सतह का ऊंचा स्थान समझना चाहिए और चपटे स्क्रेपर से खुर्च  देना चाहिए स्क्रैपर करने के लिए छोटे जॉब को वॉइस से मजबूती से पकड़ना चाहिए स्क्रैपर करने के लिए दाहिने हाथ से स्क्रैपर का हत्था पकड़ना तथा बाएं हाथ को स्क्रैपर पर उसकी कर कंधार से कुछ ऊपर रखना चाहिए स्क्रेपिंग करते इसमें स्क्रैपर को जॉब किस सतह के साथ 30 डिग्री के कोण पर रखना चाहिए।

फ्लेट स्क्रेपर से धार लगाना

लगातार प्रयोग करने के बाद स्क्रैपर की कर्तन धार कुछ घीस जाती है तो उसके खुरचने की क्षमता कम हो जाती है जिससे स्क्रैपर अपना कार्य ठीक से नहीं कर पाता इसी कारण से स्क्रैपर को कर्तन किनारे पर धार लगाने की आवश्यकता पड़ती है धार लगाने के लिए फ्लैट स्क्रैपर की कर्तन धार सिरे को थोड़ा गोलाई में घीस  दिया जाता है। इसके बाद कर्तन सिरे को ऑयल स्टोन पर रगड़ कर धार को फिनिश कर दिया जाता है इस प्रकार धार लगाने के बाद स्क्रैपर द्वारा कार्य करने  के योग्य हो जाता है।
hack-saw-frame

स्क्रैपर का प्रयोग करने पर बरती जाने वाली सुरक्षा सावधानियां

  1. सरफेस प्लेट को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए फिर उस पर सिंदुर या नील की पतली परत लगानी चाहिए।
  2. स्क्रेपिंग प्रारंभ करने से पहले हाथों को अच्छी तरह से साफ कर लेना चाहिए हाथ पर तेल या ग्रीस नहीं लगाना चाहिए।
  3. सर फेसिंग करते समय जॉब की तरह को हाथ से पोंछना या रगडना नहीं चाहिए।
  4. स्क्रेपिंग करते समय हाथ को जॉब किस सतह के ऊपर रखना चाहिए।
  5. सर्फिंग करते समय स्क्रैपर पर अधिक दबाव नहीं लगाना चाहिए।
  6. साधारणतः 0.1 2mm से अधिक धातु को स्क्रेपिंग नहीं करनी चाहिए।

की या की वे  Key or keyway

एक पार्ट से दूसरे की पार्ट को पावर संचारित करने के लिए अर्थात गति देने के लिए हब या शाफ्ट के ऊपर पुली गियर इंपैलर व दूसरे पार्टस कों लगाने के लिए इनके बीच में चाबी फिट की जाती है जिससे दोनों पार्ट जुड़कर  एक हो जाते हैं यह स्टील की बनी होती है और शाफ्ट की अक्षिय रेखा के  समान अंतर फिट की जाती है इसका साइज शाफ्ट के साइज पर आधारित होता है यह जिस ग्रुव में फिट की जाती है उसे कि वे (keyway) कहते हैं प्राय खांचे की आधी गहराई हब में और शेष आधि गहराई शाफ्ट में काटी जाती है इस प्रकार चाबी फिट करने से शाफ्ट और पुली, गियर एक साथ घूम सकते हैं चाबियां भी एक स्थाई फास्टनेस है इन्हें मुख्यतः निम्नलिखित दो भागों में बांटा जाता है:-
1 संक की (sunk key)
2 सेडल की (saddle key)
1 Sunk key:-  इस प्रकार की चाबी को फिट करने के लिए शाफ्ट और हब में  कि वे बनाने की आवश्यकता होती है।
2 Saddle key:-  इस प्रकार की की को फिट करने के लिए केवल हब में चाबी खांचा बनाया जाता है शाफ्ट पर कोई खांचा नहीं काटते।

Add caption

What is keyway?

चाबी खांचा शाफ्ट पर और हब के बीच के अक्ष के एक समानांतर चाबी को फिट करने के लिए जो ग्रुव बनाया जाता है उसे चाबी खांचा कहते हैं चाबी खांचा बनाने के लिए साइज के अनुसार मार्किंग की जाती है मार्किंग करने के लिए किसी रुल या बॉक्स स्क्वेअर का प्रयोग किया जाता है।
चाबी खांचा  हैंड और मशीन विधि से बनाए जाते हैं।
File रेती

कि को फिट करना या रिमूव करना

शाफ्ट और पुलि या गियर आदि पर सही साइज का चाबी खांचा बनाने के बाद चाबी को फिट किया जाता है चाबी को हाथ से दबाव लगाकर या हथोड़े की हल्की चोट लगा कर फिट करना चाहिए कभी-कभी शाफ्ट से पूली गियर या भील आदि को बदलने की आवश्यकता पड़ती है जिससे चाबी को भी निकालना पड़ता है इसलिए चाबी को निकालने के लिए की ड्रिफ्ट का प्रयोग किया जाता है यदि चाबी अपने चाबी खांचे में ही जाम हो जाए तो शाफ्ट से पुली गीयर या भील और इंपैलर आदि को अलग करने के लिए ब्हीलपुलर का प्रयोग किया जाता है।

Thanks for reading this blog



Saturday, November 17, 2018

Dail test indicator

डायल टेस्ट इंन्डीकेटर करता है What is dial test indicator? डायल टेस्ट इंन्डीकेटर के सिध्दांत करता है What is the principles of dial test indicator? और यह केसे कार्य करता है And how to use dial test indicator and रीडीगं कैसे लेते हैं reading with dial test indicator.

dial test indicator  सतह की जांच करने वाला एक सूक्ष्म मापी यंत्र है जिसका प्रयोग अधिकतर उत्पादन में है जॉब की परी शुद्धता को जांचने या किसी जॉब के पृष्ठों की समतलता  समानतंर  टेपरों छडो की ओवरनेस या सीधा पन का निरीक्षण करने के लिए किया जाता है इसके अतिरिक्त किसी जॉब को सही बांधने या सेट करने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है यह इंग्लिश प्रणाली में 0. 00 1 इंच और अधिक परिशुध्ता  जांचने के लिए  0.0001 इंच तथा मीट्रिक प्रणाली में 0.0 1mm और इससे भी अधिक एक माइक्रोन अर्थात 0.001एम एम तक की परिशुद्धता में मीलते है। dial gauge या dial indicator gauge भी कहते हैं।

Dail test indicator

डायल टेस्ट इंन्डीकेटर के सिध्दांत principle of dial test indicator

इसमें रेखा और पिनिंग द्वारा साइज के अंतर को यांत्रिक विधि से बढ़ा करके डायल पर दिखाया जाता है साधारणतः यह निम्न प्रकार से दिखाया जाता है :-
  1. Universal junior indicator
  2. universal test indicator
  3. last word indicator
  4. dial indicator 
डायल टेस्ट इंन्डीकेटर के मुख्य भाग:-
  • case or housing
  • Cover or brick
  • Needle or indicator 
  • Brazil
  •  Revolution counter
  • Dust cap 
  • reck or plunger
  • dial
  • steam
  • crystal
  • contact. Or know 
 Dail test indicator
डायल के 100 निशान = 1mm
डायल का एक निशान = 1/100 =0.01mm

Mitric प्रणाली :- डायल टेस्ट इंन्डीकेटर अल्पतमांक =
Main खाने के एक खाने का मान   =1/100 mm
बड़े Dail पर खानों की संख्या
= 0.01 mm =0.001 inch

ब्रिटिश प्रणाली:- indicator का न्यूनतम माप क्यों कि
डायल के 100 निशान =0.1"
इसलिए डायल का एक निशान =0.1÷100 = 1/10×1/100 =1/1000 =0.001"

You can visit our another blog:-
1  Vernier caliper.ruler
For ITI students
Surface plate


डायल टेस्ट इंन्डीकेटर का प्रयोग the use of dail test indicator

dial test indicator का प्रयोग प्राय: निम्नलिखित कार्यों के लिए किया जाता है:-
  1. किसी फ्लैट जॉब की समांतर भुजाओं को चेक करने के लिए किया जाता है।
  2. गोल जॉब की गोलाई चेक करने के लिए।
  3. मास प्रोडक्शन में एक ही साइज के कार्य की लंबाई चौड़ाई ऊंचाई आदि को चेक करने के लिए।
  4. लेथ मशीन पर केंद्रों की लाइनमैंट में सेट करने के लिए।
  5. machine tool के alignment को सेट करने के लिए।

डायल टेस्ट इंन्डीकेटर से रीडींग कैसे लेते हैं:-

रीडिंग लेने के लिए डायल टेस्ट इंडिकेटर को स्टैंड पर फिट किया जाता है स्टैंड साधारणतः base वाला या चुंबकीय आधार वाला हो सकता है प्लनजर  को नीचे और जॉब के ऊपर की दूरी को सेट कर लेना चाहिए जॉब को पल्नजरन  के नीचे सेट करते समय ध्यान रखना चाहिए कि सुई द्वारा डायल पर एक या दो चक्र लग जाए चेकिंग करते समय यदि सूई 0 से पीछे रह जाए तो समझना चाहिए कि जॉब - (minus)में है। और यदि सूई डायल पर जीरो से आगे बढ़े तो समझ लेना चाहिए कि जॉब प्लस में है।

डायल टेस्ट इंडिकेटर का प्रयोग करते समय काम आने वाली सुरक्षा सावधानियां

  1. dial test indicator को कटिंगकटिंग टूल के साथ नहीं रखना चाहिए।
  2. dial test indicator को हवा के साथ प्रयोग में नहीं लाना चाहिए।
  3. इसका प्रयोग रफ़ सरफेस पर नहीं करना चाहिए।
  4. कार्य करने के बाद इसे अच्छी तरह से साफ करके उचित स्थान पर रखना चाहिए।
www.bloggeryash.co.in

Thanks for reading this blog




Thursday, November 15, 2018

Interchangeability (limit,fits, tollerance)

अतंरविमयता क्या है?

What is interchangeability?

लिमीट क्या है what is limit? टाॅलरेन्स क्या है what is tolerance? और फिट्ज करता है what is fits?


कोई भी करण और मशीन बनाने के लिए भिन्न भिन्न आकार के पुर्जों की आवश्यकता पड़ती है जिन्हें विभिन्न प्रकार की विधियों द्वारा बनाकर एवं आपस में जोड़कर उपकरण या मशीन का रूप दिया जाता है इन पार्टस को जोड़ने वाली विधि को assembling कहते हैं परंतु कभी-कभी ये पुर्जे आपस में फिट नहीं होते जिससे उन्हें दोबारा मशीन करने या रेती  लगाने की आवश्यकता पड़ती है जिसके फलस्वरूप पुर्जों को असेंबल (assemble) करने में अधिक समय लगता है इसलिए यह अति आवश्यक है कि प्रत्येक पूरजो को अधिक परी शुद्धता से बनाया जाए ताकि जब कभी मशीन के किसी खराब या घीसे पार्ट को बदलना पड़े तो उसके स्थान पर दूसरा प्रयोग किया जाने वाला किसी कंपनी से मंगवाया जाए तो नए पार्ट बिना किसी मशीनिंग  क्रिया के आसानी से फिट किए जा सके और मशीन पहले की तरह कार्य  करने लगे। पार्ट के फिट होने के इस गुण को अंतरवीमयता कहते हैं  टूटे या खराब पूर्जे के स्थान पर नए पूरजो की अदला-बदली को पार्ट कि आपसी बदल कहा जाता है।

अंर्तविमयता क्या है?(what is interchangeability?)

जब कभी एक ही तरह के पार्ट अधिक मात्रा में बनाने हो  जो कि बिल्कुल एक ही साइज कितना आकार और परिशुद्ध था में एक दूसरे की जगह पर फिट हो जाए तो उसे अंर्तविमयता कहते हैं। इसके बहुत ज्यादा लाभ है
  1. असेंबलिंग में कम समय लगता है।
  2. इसमें rejection कम होता है।
  3. उत्पादन औरउपयोग के क्षेत्र में बढ़ोतरी होती है।
  4. घीसे पार्ट या टूटे मशीनी पार्ट को बदलने मैं सुविधा होती है क्योंकि बाजार में मिलने वाले स्पेयर पार्ट मूल पूरजो के विवरण के अनुसार बने होते हैं।
        अंतरविमयत्ता प्राप्त करने के लिए पार्ट पर कुछ निश्चित सीमा निर्धारित की जाती है यह सीमा पार्ट की कार्य पद्धति तथा फिट पर निर्भर करती है इसलिए कारीगर को सदा सीमा पद्धति में ही पार्ट को बनाना चाहिए।
सीमा पध्दति के लाभ निम्नलिखित प्रकार के हो सकते हैं:-
  • पार्ट का उत्पादन अधिक मात्रा में हो सकता है।
  • इससे परिशुद्ध का उत्पादन प्राप्त होता है।
  •  Rejection कम होता है।
  • interchangeability parts बनते है।
  • Assembling में कम समय लगता है।
  • वांछित फिट प्राप्त कर सकते हैं।

लिमीट क्या है? What is limit?

    वर्कशॉप में जब पार्ट्स का उत्पादन किया जाता है तो कारीगर को पारट के बेसिक साइज को थोड़ा बड़ा या छोटा बनाने की छूट दी जाती है।इससे पारट पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि कहीं कोई उपकरण है ऐसे होते हैं जिससे पारट को बिल्कुल परिशुद्धता साइज में नहीं बनाया जा सकता जैसे सूक्ष्म माफी औजार की गलती मशीन सेटिंग की गलती टूल की खराबी आदि के कारण पार्ट को बनाते समय साइज में कुछ अंतर आ सकता है इसके अतिरिक्त यदि पार्ट को सही परी शुद्धता माप में बना भी लिया जाए तो उसमें अधिक समय लगता है इसलिए पार्ट को बनाने के लिए सीमा निर्धारित कर दी जाती है कि पार्ट को बेसिक साइज में कितनी सीमा अधिक या कम साइज में बनाया जा सकता है उसे लिमिट कहते हैं जैसे किसी जॉब के साइज 50mm में +_    0.05 एम एम की छूट दे रखी है लिमिट निम्नलिखित प्रकार की होती है:-

Tolerance Fit, limit shaft

1. High limit:- किसी भाग के basic size पर स्वीकृत अधिक  से अधिक जिस सीमा में साइज को बनाया जाता है उसे high limitकहते है।जैसे 25.00 mm size. पर High limit= 25.02mm .
2. Low limit:- किसी पार्ट के बेसिक साइज पर स्वीकृत कम से कम जिस सीमा में साइज को बनाया जा सकता है उसे low limit कहते हैं। जेसे : 25.00 mm पर low limit= 24.98 mm .
अतः part का साइज = 25 +- 0.02 mm 

टाॅलरेन्स क्या है? What  is Tolerance?

पार्ट के किसी साइज की हाई लिमिट और लो लिमिट के अन्तर को टाॅलरेस कहते हैं। tolerance के  कई लाभ है जैसे समय की बचत और उत्पादन बढ़ता है कम कुशल कारीगर से काम लिया जा सकता है उत्पादन की लागत कम होती है और पारट कम रद्द होते हैं टॉलरेंस प्रत्येक कार्ट पर अलग-अलग होती है जैसे: 25.00 mm size पर high limit size पर high limit=25.03 mm 
Low limit=24.98 mm 
अतः tolerance =25.03 - 24.98= 0.05 mm है।
Tolerance दो प्रकार से दी जाती है


  • Unilateral tolerance
  • Bilateral Tolerances
Hole Basis tolerance:- इस प्रणाली में है छेद का साइज स्थिर रखा जाता है और टॉलरेंस केवल शाफ्ट के साइज पर दी जाती है आजकल अधिकतर होल बेसिस प्रणाली अपनाई जाती है क्योंकि किसी भी स्टैंडर्ड साइज के छेद को आसानी से बनाया जा सकता है।
Shaft Basis tolerance:- इस प्रणाली में शाफ्ट का साइज स्थिर रखा जाता है और tolerance केवल छेद के साइज पर दी जाती है। यह प्रणाली होल बेसीज से कम अपनाई जाती है।
What is allowance?
 जब किसी निर्धारित फिट के अनुसार 2 पार्ट को बनाकर आपस में मिलाया जाता है तो इन दोनों पारट की मापों  में जानबूझकर जो अंतर रखा जाता है उसे अलाउंस Allowance कहते हैं अलाउंस का सम्बंध फिट होने वाले दोनों ही पार्ट से होता है ना की किसी एक पार्ट से किसी फीट के अनुसार अलाउंस धनात्मक या ऋणात्मक (+-) हो सकता है। Maximum Allowance and minimum Allowance

Limit,fits Allowance

दोनों के बीच में अन्तर Differen between Tolerance and Allowance?

  1. tolerance बेसिक साइज पर आधारित होती है जबकि Allowance Fit के प्रकार पर आधारित होती है।
  2. Tolerance एक ही जॉब के विभिन्न विभिन्न साइज पर अलगअलग हो सकती है जबकि Allowance दो matching पार्ट पर दिया जाता है।
  3. tolerance blueprint या drawing के आदेशानुसार रखी जाती है जबकि Allowance इच्छित fit प्राप्त करने के लिए जानबूझकर रखी जाती है।

फिट क्या है?  What is Fit?

किसी भी मशीन के अलग-अलग प्रकार के कई parts से असेंबल करके बनाया जाता है इसमें कुछ ऐसे विशेष पार्ट होते हैं जिनके साइज को सूक्षमता से बनाया जाता है और वह आपस में स्लाइड करते हैं या घूमते हैं इन असेंबल किए जाने वाले parts के बीच क्लीयरेंस की मात्रा से बनने वाले सम्बध को फिट कहते हैं इसे तीन ग्रुप में बांटा जाता है:-
  1. Clearance:- जब शाफ्ट सुराख के अंदर स्वतंत्र घूमे उनमें किसी किस्म की कोई रुकावट ना हो तो उसे क्लीयरेंस कहते हैं ताकि फिट होने के बाद कुछ क्लीयरेंस रनिंग और पुश आदि इस में आते हैं।
  2. Trasition Fit :- इसमें छेद और शाफ्ट के बीच में अलाउंस इतना रखा जाता है कि यह ना ही उसमें उतना अधिक क्लीयरेंस न अधिक इंटरफेरेंस रह सके इसमें पुश फिट आते हैं।
  3. Interfearance Fit :- इसमें छेद का साइज शाफ्ट के साइज से कम होता है इसमें पार्ट्स को हाथ के दबाव से स्लाइड कर सकते हैं इसमें  निम्नलिखित आते हैं:-        force Fit , Drawing Fit , Shrinkage Fit etc.

लिमीट और फिट की विभिन्न प्रणालियां :-

     वेसे तो दुनिया में limit और फिट्ज की बहुत प्रणालियां है परन्तु इनकी सबसे अधिक प्रचलित प्रणाली निम्नलिखित तीन ही है:-
  1. न्यूल प्रणाली:- Engineering Company ने संसार के बड़े बड़े कारखानों में विभिन्न प्रकार की फिट पर दिए जानेवाले tolerance के उपर विस्रीत खोज करने के बाद एक  तिहाई(1/3) दो 1/2,से 6 ब्यास के छेदों के ा लिए tolerance निश्चित की यह प्रणाली hole basis द्वारा जिसमें किसी प्रकार की फिटिंग प्राप्त करने के लिए व्यास व्यास को स्थिर रखा जाता है। परिशुद्धता  के आधार पर छेदों को  A और B श्रेणी में रखा जाता है। इस प्रणाली में force Fit,  ड्राइविंग fit, push fit, तथा रनिंग फिट आती है।
  2. British Standard :-  इस प्रणाली में 21 प्रकार के भिन्न-भिन्न फिट प्राप्त करने के लिए होल साइज एकतरफा और दो तरफा 16 ग्रेड में Tolerance दी जाती है यदि किसी छेद या shaft  में टॉलरेंस दी जाती है तो छेद या शाफ्ट के निशान के साथ Tolerance का नंबर भी लिया जाता है जैसे एच 7 और जी6 आदि ।
  3. भारतीय मानक पध्दति :- भारत में ब्रिटिश पध्दति के आधार  पर पहले यह पद्धति इन्चों inches में थी जिस समय  16 लिमीट और फिट की पद्धतियां थी जिन्हें ID 1 से आई डी 16 तक व्यक्त किया जाता है तथा मौलिक जिन्हे ब्रिटिश पद्धति के अनुसार व्यक्त किया जाता है।




Tuesday, November 13, 2018

Die

डाई क्या है?  What is die? डाइ स्टाॅक करता है? What is die stock? और डाइ स्टाक से चुडीयां निकालने की विधि।

जिस प्रकार भीतरी चूड़ियां काटने के लिए Tap and tap wrench टेप का प्रयोग किया जाता है उसी प्रकार से बाहरी चूड़िया काटने के लिए डाई का प्रयोग किया जाता है इस प्रकार की बाहरी चूड़ियां वाले भागों के कुछ सामान्य उदाहरण बोल्ट स्टैंड व पाइप है डाई में वी आकार की स्टैंडर्ड चूड़ियां कटी होती है और कटिंग एज बनाने के लिए कुछ फ्लूट भी बनाए जाते हैं डाई प्राय हाई कार्बन स्टील  से बनाई जाती है और इसे हार्ड एवं टेंपर किया जाता है इसके अतिरिक्त डाई टूल स्टील की बनाई जाती है डाई गोल या चौरस होती है जिसके अंदर चूड़ियां कटी होती है चूड़ियों में कर्तन धार एज बनाने के लिए फ्लूट भी कटी होती है डाई के एक तरफ की शुरू चूड़ियां चैंम्फर की होती है ताकि वह अपने साइज की छड़ सुविधा पूर्वक प्राप्त कर सके कार्य के अनुसार वे प्रायः निम्नलिखित प्रकार की होती है:-

Die 

  1. ठोस डाई 
  2. spindle die
  3.  adjustable die 
  4. die  nut
  5. Die plate
  6. Single for

डाई स्टाॅक क्या है What is die stock?

बाहरी चूड़िया काटते समय जिस साधन के द्वारा डाई को पकड़कर प्रयोग किया जाता है उसे डाइ स्टोक  कहते हैं इसकी बॉडी छेद पर डाई के पकड़ने और समायोजित करने के लिए सेट स्क्रु लगे होते हैं कार्य के अनुसार डाई स्टाॅक भिन्न भिन्न प्रकार के प्रयोग में लाए जाते हैं जो निम्नलिखित प्रकार से है  ््   
1 solid die stock and
2  adjustable die stock

Die and die stocks


डाई स्टाॅक से चुडीयां निकालने की विधि Method of threading in die stock?

डाई से  बाहरी चूड़ियां काटते समय निकालने के लिए कार्य कार्य विधि प्रयोग में लाते है जो निम्नलिखित प्रकार से है:-

  1. जिस जॉब पर चूड़ी काटनी हो उसके व्यास का साइज चेक कर लेना चाहिए।
  2. राॅड के जिस सीरे पर चूड़ियां काटनी हो उस पर रेती धार बॉडी से चेक कर लेना चाहिए।
  3. डाई स्टाॅक में डाई को पकड़ लेना चाहिए।
  4. डाई पर अधिक दबाव नहीं डालना चाहिए2।
  5. चुडीयां काटते समय आधा चक्कर आगे और आधा पीछे लगाना चाहिए।
  6. जॉब को धातु के अनुसार सही लुब्रिकेंट का प्रयोग करना चाहिए।
  7. कटी हुई चिप्स को साफ करने के लिए ब्रश का प्रयोग करना चाहिए।
  8. क्रिया समाप्त होने के बाद डाई और डाई स्टॉक को अच्छी तरह से तेल या ग्रीस लगाकर रखना चाहिए।

You can follow our another blog



डाई का प्रयोग करते समय बरती जाने वाली सुरक्षा सावधानियां precaution to be used with the work with die 

  1. डाई से चूड़ियां काटने की क्रिया शुरू करने से पहले डाई और जॉब को साफ कर लेना चाहिए।
  2. जिस राॅड पर चूड़ियां काटनी हो  उसका साइज चेक कर लेना चाहिए।
  3. राॅड के जिस भाग पर चूड़ियां काटनी हो  उसे थोड़ा सा चैमफर  कर लेना चाहिए।
  4. जाॅब को अच्छी  तरह से बीच वाइस  में पकड़ना चाहिए।
  5. डाई का आधा चक्र आगे और आधा पीछे रखना चाहिए। 
  6. चूड़ियां काटते समय लुब्रिकेंट का प्रयोग करना चाहिए।
  7. एक ही तार में पूरी गहराई की चूड़ियां काटने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।
  8. स्प्लिट तथा स्पीसल  ड्रेस को दो या तीन समायोजित करके पूरी गहराई की चूड़ियां काटने चाहिए।
  9. चूड़ियां काटते समय डाई स्टॉक पर दोनों तरफ सामने दवाब देना चाहिए अन्यथा चूड़ी दूर जाएगी।
  10. कार्य समाप्त करने के बाद डाई को ग्रीस या तेल लगा कर रखना चाहिए।
Thanks for reading this blog


Sunday, November 11, 2018

Tap wrench

टेप रेन्च क्या है? What is Tap wrench?

यह एक प्रकार का टूल है जिसका प्रयोग हेंड टेपिंग करते समय टेप को पकडने के लिए किया जाता है निम्नलिखित टेप ड्रिल  प्रयोग में लाए जाते हैं:-
  1. Solid tap wrench
  2. Adustable tap wrench
  3. T handle Tap wrench
Tap wrench

 Tap wrench के द्वारा हस्त टेपींग विधि

  1. जॉब को टेप के साइज के अनुसार सही साइज का drill  होल कर लेना चाहिए और ध्यान रखना चाहिए कि drill hole  और बिल्कुल सीधा है।
  2. ड्रिंल करते समय सूराख के मुंह पर आए बाबरी को हटाकर हल्का सा चेम्फर कर लेना चाहिए।
  3. टेंपर टेप को टेप रिन्च मैं अच्छी तरह से पकड़ लेना चाहिए।
  4. टेप को ड्रिल होल में रख कर दो या तीन चक्र घुमाने चाहिए फिर टेप रिन्च  को निकालकर try square से चेक कर लेना चाहिए चेकिंग करने के बाद टेप को पुनः टेप रिन्च में पकड लेना चाहिए।
  5. यदि टेप जॉब की सरफेस से 90 डिग्री में टेपिंग ना कर रही हो तो टेप को सीधा करके टेपिंग करनी चाहिए।
  6. टेपिंग करते समय टैप का आधा चक्र आगे और आधा पीछे चलाना चाहिए ताकि चिप्स टूटकर बाहर निकल जाए।
  7. टेपींग करते समय  जॉब की धातु के अनुसार सही लुब्रिकेंट का प्रयोग करना चाहिए।
धातु steel, aluminium, cast iron, brass आदि हो सकते हैं।
तथा लुब्रिकेंट oil,water,parrapine, आदि हो सकते है।

बंद छेद टेपिंग विधी Blind Hole Taping Mathod

बंद छेद में टेपिंग करते समय बहुत सावधानी रखनी पड़ती है

  1. बंद छेद में टेपिंग करते समय टेप को बार-बार निकालते रहना चाहिए ताकि कटी हुई चिप्स बाहर निकल सके।
  2. बंद छेद में टेपिंग करते समय फिनिशिंग टेप का प्रयोग करना चाहिए ताकि सुराग की तली तक पूरी चुडीयां काटी जा सके।

टेप टूटने के कारण the cause of tap brocken

  1. टेप के साइज के अनुसार किया हुआ सुराग छोटा होना।
  2. टेपिंग करने के लिए किया हुआ सुराग टेपर में होना।
  3. टेपिंग करते समय टेप पर अधिक दबाव देना।
  4. टेप के कटिंग  thred का घीस जाना।
  5. job को bench vice में ठीक से नहीं बांधना।
  6. Tapping करते समय lubricant का प्रयोग न करना।

Tap wrench

टुटे हुए टेप को निकालने की विधि

  1. यदि टेप जॉब की सरफेस से कुछ ऊपर से टूटी है तो कुटी हुई टेप को round nose plier से पकड़कर निकाल देना चाहिए।
  2. यदि टेप जॉब की सरफेस में से ही टूट गई है तो टूटी हुई टेप को पंच व हथौड़े की चोट लगा कर निकाल दिया जा सकता है।
  3. जाॅब में टूटी हुई टेप को बाहर निकालने के लिए एक विशेष प्रकार के टूल का प्रयोग करना चाहिए जिसे टेप एक्स ट्रेक्टर कहते हैं।
  4. Tap Extractor के न होने पर या जिस समय टेप के कई टुकड़े हो जाए उस अवस्था में नाइट्रिक एसिड की बुंदे डालनी चाहिए।
  5. यदि टेप जॉब की सरफेस से नीचे टूट गया हो तो टूटी हुई टेप को जॉब के साथ गर्म करके एनालिंग विधि (aniling mathod) प्रयोग करनी चाहिए।

स्टड extractor क्या है? What Is Stid Extractor?

      यह टेप जैसा ही होता है परंतु अंतर केवल इतना है कि यह टेपर  में बना होता हैै और उस पर दो या तीन स्टार्ट की left hand चुडीयां बनीबनी हुई होती है। टूटे हुए टेप या स्टड को निकालने के लिए इनको सुराख में डालकर उल्टी दिशा में घुमाते हैं जिससे यह  सुराख तच्छी तरह से ग्रीप  कर देता है या आसानी से बाहर कर लेता है।

टेप का प्रयोग करते समय बरती जाने वाली सुरक्षा सावधानियां (precautions to be used at the time of taping)

  1. Tapping करने से पहले टेप और जॉब को अच्छी  साफ कर लेना चाहिए।
  2. टेपिंग करने के लिए सही साइज के ड्रिल से छेद करना चाहिए।
  3. टेपिंग करने के लिए सही साइज के drill से छेद करना चाहिए।
  4. टेपिंग करते समय टेप का आधार चक्र आगे आधा पीछे लगाना चाहिए। 
  5. टेपिंग करते समय सही साइज के टेप रीन्च  का प्रयोग करना चाहिए।
  6.  टेपिंग करते समय टेप रिन्च पर ना तो अधिक दबाव लगाना चाहिए ना ही अधिक झटका लगाना चाहिए।
  7. टेपिंग करते समय धातु के अनुसार उचित लुब्रिकेंट का प्रयोग करना चाहिए।
  8. काम करने के बाद टेप की चूड़ियों को साफ करके उचित स्थान पर रख देना चाहिए।

Vice,first aid,